कई बार सड़क किनारे या मंदिरों के बाहर बैठे लोगों को देख के कुछ लोगों के मन में दया का भाव उत्पन्न होता है तो कुछ उनको देख के मुंह बिचकाते है। किसी को उनके प्रति कुछ करने की धारणा कचोटती है, तो किसी को उनसे दूर भागने की जल्दी होती है। जो कुछ करना चाहते है वो उनको चंद सिक्के देके खुद को बहुत भारी परोपकारी मानते है और जो उनके स्पर्श मात्र से खुद को अशुद्ध महसूस करते है वो उनको मेहनत से कमाने-खाने की सलाह देके आगे बढ़ जाते है।
धुंधली सच्चाई: ठिठुरती ठंड में बिलखती भूख एक अनोखी कहानी

इस पूरी प्रक्रिया में एक चीज जो स्थिर रहती है वो है उम्मीद भरी वो नजरें जो हाँथ फैलाये हर आने जाने वालों को ताकती है और उम्मीद करती है की वो अपनी भरी हुई जेब में से एक छोट सा सिक्का निकाल के उनकी हथेली पे रखेगा।
आज ऐसी ही एक परिस्तिथी यूँ ही अपनी गाड़ी में बैठे-बैठे तकरीबन आधे घंटे तक देखती रही। तरह- तरह के ख्याल मन में आते रहे और मैं बेसुध बस मंदिर के बहार सड़क के किनारे बैठे उन परिवारों का काफिला देखती रही।
कुछ भक्त शनि मंदिर से निकल के उन्हें प्रसाद रुपी लड्डू दे रहे थे। उन लड्डुओं को देख मैं ये सोचने पे मजबूर हो गयी की क्या इन लोगों की कोई इच्छा नहीं होती। एक के बाद दूसरी मिठाई खाते वक़्त हमारा मन भर जाता है और कुछ नमकीन खाने की चाहत होने लगती है तो क्या इन बेचारों को ऐसी परिस्तिथी का सामना नहीं करना पड़ता। <
मैं इन्ही ख्यालों में खोयी थी तभी मेरी नजर एक आदमी पे पड़ी जो हाँथ में समोसे की थैली लिए उन लोगों में समोसे बाँट रहा था। आमतौर पे अगर कोई ये देखता तो सोचता की शायद ये आदमी निर्मल बाबा जैसे ही किसी बाबा का भक्त होगा और उन्होंने ही इसे ये सलाह दी होगी। पर उन गरीबों के हाँथ में समोसे देख मुझे थोडा सुकून मिला शायद मेरे ही जैसा सोचने वाले और भी हैं दुनिया में।
पर क्या इतने से इनका पेट भर जायेगा। ये ख्याल मेरे मन में आया ही था कि तभी मैंने देखा की एक अंकल जी हाँथ में बोरी लिए उनके पास आये। मैं उत्साहित होके उन्हें देखने लगी। वो अंकल जी बोरी से चार-चार ब्रेड निकाल के उन सबके हाँथ में दे रहे थे। मुझे थोड़ी ख़ुशी हुई, पर तब तक वो समोसे वाले भैया वापस से समोसे बांटते हुए लौट रहे थे।
मैं उनकी परिस्तिथी समझने की कोशिश ही कर रही थी की तभी मैंने उन्हें ब्रेड वाले अंकल जी से कहते सुना की पहले उन्होंने बच्चों को समोसे नहीं दिए थे अब बच गए तो बच्चों को बाँट रहे है। वो अंकल जी और वो समोसे वाला आदमी दोनों ही आज भूखों का पेट भरने के मूड से निकले थे शायद।
मैंने देखा की उन्होंने एक रिक्शे वाले को हाँथ देके रोका और उसे भी खाने को दिया। खैर जब मैंने बच्चों पर नजर दौडाई तो देखा एक छोटा सा बच्चा मुश्किल से दस-ग्यारह महीने का अपनी माँ को पकड खूब रो रहा था। भूखा था शायद, पर उसकी माँ तो उन आने-जाने वालों को निहार रही थी जिनके पास उसके बाकी के तीन बच्चे खाना लेने गए थे।
उसी के बगल में एक दूसरा परिवार था, उस परिवार की महिला कुछ खा रही थी और उसके दो बेटे वही बगल में लेटे मोटा सा कोई कपडा ओढ़े थे, ठंड लग रही थी शायद उनको। उन दोनों बेटों में एक तक़रीबन दस साल का रहा होगा तो दूसरा मुश्किल से एक साल का। ठंड का आलम कुछ यूँ था कि बड़े लड़के ने छोटे लड़के को दो तमाचे मारे और पूरी ओढनी खीच के ओढ़ ली और वो छोटा मासूम नम आँखों के साथ यूँ ही गुमसुम बैठा रहा। शायद वो भी अपने भविष्य का सच देख-समझ रहा था।
वो दूध के लिए रोता बच्चा और ये ठंड से ठिठुरता बच्चा ये दोनों भी आने वाले कल में शायद यूँ ही भाग-भाग के लोगों से खाना मांगेंगे और लाके अपनी माँ को देंगे और उसकी माँ आज ही की तरह तब भी उन सब खाने की चीजों को एक थैली में रखती जाएगी।
कईयों को कहते सुना है की इन लोगों को पैसे नहीं रोजगार दो। कईयों को कहते सुना है की इन लोगों को पैसा देने का कोई फायदा नहीं उस पैसे से ये लोग पान-मसाला, दारु जैसे हानिकारक उत्पाद खरीद के खाते है और खुद मैंने ये देखा भी है। पर क्या पैसे न देना ही इस बीमारी को ठीक कर देगा? क्या पैसे न देने से इनकी लाचारी दूर हो जाएगी?
हम जानते है की इनमे से कई उन पैसों का गलत इस्तेमाल करते है पर फिर भी हम उन्हें पैसे देते है क्यूँ? सिर्फ और सिर्फ अपने आंतरिक सुकून के लिए। और अगर रोजगार की बात करें तो जो 20-30 प्रतिशत लोग उन्हें रोजगार दे सकते हैं उन्हें पढ़े लिखे लोग चाहिए।
मैंने कई ऐसे विज्ञापन देखे है जिसमे स्वीपर, ड्राईवर से लेके माली तक उन्हें दसवीं पास चाहिए और बाकी के 70-80 प्रतिशत लोग तो नौकरी करने या नौकरी पाने में व्यस्त हैं। इनके लिए रोजगार की ना तो व्यवस्था है ना ही कोई साधन। ऐसे में ये अगर हाँथ ना फैलाएं तो क्या करे।
मिडिल क्लास फॅमिली में जहाँ चार लोगों का एक परिवार (पति-पत्नी और दो बच्चे) होता है, वही इनके समुदाय में एक परिवार में कम से कम चार तो बच्चे होते है। ऐसा इनकी इच्छा के कारण नहीं बल्कि इनकी जरुरत और मज़बूरी के कारण होता है। जितने ज्यादा बच्चे उतना ज्यादा खाना और उतनी ज्यादा कमाई।
अभी हाल ही में एक आर्टिकल में मैंने दो मांगने वालों की संपत्ति का ब्यौरा पढ़ा। उनके पास बचत के एक करोड़ रूपए, दो बंगले, सोना-चांदी और खुद की एक गाडी थी। और तो और उनके बच्चे अंग्रेजी स्कूल में पढ़ते है।
वहीँ कुछ दिनों बाद अपने प्रधानमंत्री जी की संपत्ति का ब्यौरा पढने को मिला जिनके अनुसार उनके पास बचत खाते में चंद हजार रूपए, चार सोने की अंगूठियाँ और मात्र पच्चीस रूपए उनकी जेब में हैं। तो इस लिहाज से तो प्रधानमंत्री जी उन मांगने वालों से भी गरीब निकले। खैर यहाँ मैं किसी की संपत्ति पे कोई टिपण्णी नहीं करना चाहती बस एक अनुमान लगाने का प्रयास कर रही थी की क्या दिखने में गरीब और मांगने वाले सच में गरीब होते है? या मांगना उनका पसंदीदा काम है जो बिना मेहनत के ज्यादा आमदनी देता है।
एक मांगने वाला है जो प्रधानमत्री से भी ज्यादा धनी है और वही दूसरी तरफ मांगने वालों का काफिला है जिनके पास बिछाने को चादर और खाने को बर्तन तक नहीं है। ऐसे में कैसे पता चले की कौन सा मांगने वाला वाकई में जरुरतमंद है और कौन शौकिया इस बीमारी को बढ़ावा दे रहा है।
इन गरीबों को पैसे, कपडे, खाना देना गलत नहीं है... पर हाँ मेरे हिसाब से पढ़े लिखों को माली, ड्राईवर बनाने के बजाये इनको वो जगह, प्रशिक्षण और एक मौका देना कि ये खुद से अपने लिए छत बना सके बहुत बड़ा पुण्य का काम है।
एक बार सोचने और कोशिश करने में क्या हर्ज है....?
Reference - दर्शिका केसरवानी "(दक्का)"

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