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आरक्षण की कहानी: काबिल कौन हिंदी में

विद्यापति त्रिपाठी के पास धन, वैभव, सम्मान सब कुछ था। बड़े ही दयालु व्यक्ति थे। उनका लड़का भी बड़ा होनहार था कुशाग्र बुद्धि का। धनधान्य, वैभव से परिपूर्ण परिवार में पला-बढ़ा आनंद बड़ा ही कोमल था।
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त्रिपाठी जी का नौकर घूरे बरई बचपन से ही उनकी चाकऱी करता था। उसका लड़का जंगीलाल आनंद के ही उम्र का था। घूरे अनपढ़ था किंतु त्रिपाठी जी के यहाँ रहकर उसने पढाई का महत्व समझा था। वह जंगी को पढ़ाना चाहता था किंतु धनाभाव के कारण मन मसोस के रह जाता।
जंगी अपने माँ-बाप के साथ उसी गाँव में अपनी टूटी झोपड़ी में रहता था। अक्सर त्रिपाठी जी के घर जाता रहता था उनके ठाट देखकर उसका भी मन लालायित होता किन्तु घूरे उसे समझाता, "हमारी इतनी औकात नहीं तुम पढ़कर कुछ बन जाओ तब सोचना।"
कभी-कभी आनंद जंगी से बातें करने लगता तो त्रिपाठी जी जंगी को भगा देते। ऐसा नहीं था कि जंगी के प्रति उनकी दुर्भावना थी बल्कि उनका विचार था कि संगति का असर पड़ता है। नौकर के लड़कों के साथ से उसमें सभ्यता नहीं आ सकेगी। इसलिए घूरे को समझाते थे "अपने लड़के को यहां न लाया करो, शैतानी करता है। "
यूं ही नहीं कहा था उन्होंने बल्कि उन्होंने अनुभव किया था। एक दिन त्रिपाठी जी गाँव के प्राइमरी स्कूल के सामने से जा रहे थे। उनके सामने से एक सांप निकला जिसे जंगी ने मिड डे मील खाते समय देख लिया। खाना छोड़ के वह ईंट लेकर दौड़ा, त्रिपाठी जी मना करते रहे गये और उसने सांप के सिर को निर्भयता और क्रूरता के साथ ईंट से कुचल दिया।
एक दिन त्रिपाठी जी की पत्नी सूर्य के अभिमुख होकर आँख बंद कर शिव जी को जल चढ़ा रही थीं और बगल में आनंद हाथ जोड़े शिव जी को देख रहा था। अचानक बिच्छू निकल आया, आनंद चिल्लाता हुआ भागने लगा। त्रिपाठी जी के कुत्ते को नहला रहा जंगी चप्पल हाथ में लेकर दौड़ा और शिव जी के पास ही बिच्छू का वध कर दिया। शिवालय में हत्या हो गयी वो भी अपवित्र चप्पलों से। उस दिन घूरे पर बड़ी डाँट पड़ी।
आनंदमणि त्रिपाठी और जंगीलाल चौरसिया एक ही कक्षा में पढ़ते थे, किन्तु आनंद शहर के नामी कॉन्वेंट में और घूरे गाँव के बदनामी सरकारी में। दोनों ही स्कूल में टॉप करते, चाहे पढाई हो या खेल लेकिन आनंद कॉन्वेंट में और जंगी सरकारी में। आनंद क्रिकेट में टॉप करता और जंगी गुल्ली-डंडा में। दोनों ही अपने - अपने क्षेत्र में पारंगत थे, बस सुविधाएं, अवसर और परिस्थतियां भिन्न थीं।
आनंद उर्ध्वपातन स्कूल की प्रयोगशाला में सीखता और जंगी रोटी पकाने वाले तवे पर। आनंद पृथक्करण की विधियां प्रयोगशाला के बीकर में सीखता और जंगी अपने पिता के फ़टी धोती और टूटी बाल्टी में।
आनंद स्कूल से आकर होमवर्क पूरा करता, 1 घंटे टी वी देखता, फिर दो विषयों की अलग-अलग शिक्षक से ट्यूशन पढता, फिर उसके घर वाले उसे पढ़ाते या उसे स्वाध्याय के लिये बैठा देते। जबकि जंगी को स्कूल से आने पर भैंस के लिये चारा काटकर लाना पड़ता, उसे जानवरों को देना पड़ता, खेत की निराई-गुड़ाई करनी पड़ती, मजदूरी करके आयी माँ के हाथ-पैर भी दबाने पड़ते और फिर खाना बनाने में भी थोड़ा सहयोग करना पड़ता। इतनी थकान के बाद जब वह ढिबरी जलाकर पढ़ने बैठता तो भयंकर नींद का सामना करना पड़ता।किन्तु खाना खाने के पहले तक वह अपने गृहकार्य और स्वाध्याय करता। खाने के बाद नींद उस पर हावी हो जाती।
सुबह आनंद को उसके घर वाले उठाकर उसे उसके सब्जेक्ट याद कराते फिर उसे नहलाते, कपडे पहनाते और ऑटो में बैठाकर विदा करते। और जंगी सुबह 4 बजे उठता 2 घंटे पढाई करता, 2 घंटे पिता के साथ खेत में काम करता फिर माँ बाप के साथ खाना खाकर स्कूल जाता। उसकी माँ मजदूरी करने और पिता त्रिपाठी जी के यहाँ जाते। खेलने और शैतानी करने का समय उसे सरकारी स्कूल में ही मिल पाता।
दोनों बच्चे 8वीं तक टॉप करते रहे। फिर हाईस्कूल के लिए जंगी को भी शहर के सरकारी स्कूल जाना पड़ा जो गाँव से 8 किमी पर था। दोनों के पढाई की दिनचर्या वही थी, हां आनन्द की एक ट्यूशन और बढ़ गयी थी और शाम को जंगी ने अपना स्वाध्याय 2 घंटे बढ़ा दिया था।
शहर के स्कूल में गिल्ली-डंडे की कोई अहमियत न थी, हां उसके बचपन का गंदे तालाब में तैरना काम आया।वह तैराकी में हमेशा फर्स्ट आता। यहीं उसने फुटबॉल सीखा। एक दिन स्टेडियम में आनंद से मुलाक़ात हो गयी। दोनों अपने-अपने दोस्तों के साथ खेलने गये थे। हालाँकि ये मुलाकात अचानक थी। बातों-बातों में फुटबॉल खेलने का प्लान बन गया। एक तरफ आनंद दूसरी ओर जंगी। यहाँ आनंद ने जंगी का हुनर देखा, हालांकि जन्गी मैच हार गया। लेकिन कई बार उसने आनंद को गिरने से बचाया और उसकी चोट को अपने ऊपर लिया।
इंटर मे संयोग से दोनों के स्कूलों का शैक्षिक भ्रमण एक ही जगह गया। दोनों विद्यालयों के शिक्षकों ने एक साथ घूमने की योजना बनायी। नेशनल पार्क में घूमते समय एक बार जंगली कुत्तों ने बच्चों को दौड़ा लिया। सब इधर-उधर भागने लगे। आनन्द के पीछे दो कुत्ते पड़े, एक कुत्ता जंगी के पीछे। आनंद के प्राण-पखेरू उसकी चुटिया पर आ गए थे। वह जी-जान लगाकर चिल्लाता हुआ भाग रहा था।
उसकी चीख सुनकर जंगी अपनी परवाह छोड़कर उसे बचाने दौड़ा। उसने आनंद को पेड़ पर चढ़ने को कहा किन्तु भयाक्रांत आनंद सिर्फ भागता रहा। जंगी को बांस का एक टुकड़ा मिल गया, उससे उसने आनंद के पीछे पड़े कुत्तों को मारा तो वे सब तीनो जंगी पर टूट पड़े।
जंगी तीनो कुत्तों से उलझ गया जबकि आनंद भयाक्रांत भागता रहा और सामने नदी में घुस गया। नदी में भागने की रफ्तार बनी न रह सकी और वह गिर गया,वहां गड्ढा था वह डूबने लगा। जंगी किसी तरह कुत्तों को घायल कर उसे बचाने दौड़ा। नदी के बहाव में आनंद गहराई में चला गया लेकिन जंगी कुशल तैराक था, वह बचा लाया।
इसके बाद दोनों के रास्ते अलग हो गए। स्नातक में प्रवेश के लिये आनंद दिल्ली गया, जंगी को पढ़ाने के लिये पैसे न थे लेकिन घूरे किसी भी कीमत पर पढ़ाना चाहता था। उसने खेत बेच दिया और जंगी को इलाहबाद भेजा। खर्चे से बचने के लिये जंगी ने कला वर्ग से प्रवेश लिया। खेत बेचते समय उसने पिता की आँखों में आंसू देखे थे इसलिये अपना खर्च स्वतः उठाने का निश्चय किया।
सुबह अखबार बेचता, शाम को दो घंटे ट्यूशन पढ़ाता। पढाई में दिन रात एक कर दिए उसने किन्तु माता-पिता की चिंता के कारण उसका मन एकाग्रचित्त न हो पाता। उसकी स्मरण शक्ति जो विषय एक घंटे में याद कर लेने की थी, उसे वह चिंता और तनाव के कारण दो घंटे में याद कर पाता था। इसलिए उसे पढाई के घंटे बढ़ाने पड़े थे।
रात में बिजली जाने पर वह छत पर स्ट्रीट लाइट की रोशनी में पढता, गर्मी में वह बिन पंखे के भी रह लेता। बस एक ही धुन सवार थी कि किसी तरह कुछ बन के दिखाना है। चार पुस्तों से चली आ रही चाकरी को खत्म करना है। कठिनाइयों एवं प्रतिकूल परिस्थितियों में पला-बढ़ा जंगी मन से भी फौलाद था और तन से भी, फौलादी तन और मन में फौलादी इरादे ही पनपते हैं। बचपन की शैतानियां और अक्खड़पन गरीबी की ठोकरों के कारण अब गाम्भीर्य में परिवर्तित हो चुका था।
इसी बीच उसकी माँ गंभीर रूप से बीमार पड़ीं, खेत बेचने पर भी पैसे कम पड़ गए। घूरे ने त्रिपाठी जी से कर्ज मांगे किन्तु त्रिपाठी जी ने न दिए। उचित दवा न हो पाने के कारण घर पर ही जंगी की माँ ने उसकी गोदी में प्राण त्याग दिये। घर एक पाई न थी, यहाँ महापात्र को भी पैसे देने पड़ते थे,इसलिए घूरे ने घंट ही न बंधवाए।
त्रिपाठी जी परंपरा तोड़ने पर आग बबूला हो गए। उन्होंने उसे न केवल अपने घर से बहिष्कृत किया अपितु पूरे समाज से उसे बहिष्कृत करवाया। जंगी की माँ के ब्रह्मभोज में कोई खाने न गया। जंगी की मानसिक स्थिति पर यह सब बज्रपात था, वह अब पिता को अकेला छोड़ पढ़ने कैसे जाए। लेकिन घूरे ने हिम्मत दिखाई और उसे जबरन फिर इलाहबाद भेजा, यह कहते हुए कि वह मजदूरी करके जी लेगा लेकिन जंगी को अब कुछ बनके ही गाँव में कदम रखना। जंगी इलाहाबाद गया, अब पिता से केवल फोन पर बात होती।
पांच वर्ष बाद आनंद और जंगी का रिजल्ट आया। आनंद 2 अंकों से आई ए एस की परीक्षा उत्तीर्ण करने से चूक गया जबकि जंगी उससे कम अंक पाते हुए भी आई ए एस में ओबीसी होने के कारण चयनित हो गया।
ओबीसी का सबसे अंतिम अभ्यर्थी जो जनरल कैटेगरी में क्वालीफाई किया उसने आनन्द को चयन सूची से बाहर कर दिया,और ओबीसी कैटेगरी की एक सीट रिक्त कर दिया जिस पर चयनित होने वाला ओबीसी वर्ग का ओबीसी वर्ग में अंतिम अभ्यर्थी जंगी था।
हम कह सकते हैं कि जंगी का चयन आनन्द की कीमत पर हुआ था और हमें आनंद के प्रति अन्याय होता प्रतीत होता है। किंतु यहाँ चयन का मानदंड काबिलियत है,आप निर्णय करें कि आनंद और जंगी में काबिल कौन ?
अपने प्राणों की परवाह न कर दूसरों को बचाने वाला जंगी या अपनी जान न बचा पाने वाला आनंद ? निर्भीक एवं साहसी जंगी या कुत्ते के डर से भागने वाला आनन्द? विपरीत परिस्थितियों का सामना करते हुए आई ए एस तक पहुंचने वाला जंगी या आनंद ? आर्थिक तंगी से जूझता जंगी या सर्व सुविधासंपन्न आनन्द? स्ट्रीट लाइट में पढ़ने वाला जंगी या लाइट जाने पर सो जाने वाला आनन्द? घर से सारे काम करते हुए पढ़ लेने वाला जंगी या केवल किताब रटकर वहां तक पहुंचने वाला आनन्द?
यदि आनंद जितनी सुविधा जंगी को मिलती तो क्या वह जनरल में भी टॉप न कर जाता? या आनन्द को जंगी के घर रखकर पढ़ाया जाता तो क्या वह ओबीसी वर्ग में भी क्वलिफाई करने लायक था?
आरक्षण जंगी जैसे मजबूत मानसिक शक्ति, निर्भीक एवं कर्मठ लोगों को सेवा में लाने का माध्यम है, न कि बैसाखी। आप कल्पना करे आरक्षण ने योग्य आनन्द को चयन सूची से बाहर किया या योग्य जंगी को अंदर किया?
Reference- मणिराम मौर्य(लेखक)
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