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एक अनोखी प्रेम कथा- बिन ब्याही शाहिद की विधवा

एक अनोखी प्रेम कथा- बिन ब्याही शाहिद की विधवा 

मॉल के बाहर गाड़ी पार्क कर निकल ही रही थी कि पीछे से जानी पहचानी आवाज सुनाई दी शिल्पी दीदी। मैंने पीछे मुढ़कर देखा अरे पिंकी तुम यहां..... क्या कर रही हो? उसने बड़े प्यार से पीछे से पकड़ते हुए कहा चलिए तो सही सब बताती हूं। हम आकर खाने की टेबल पर बैठ गए ...वो खाने का आर्डर करने लगी और मैं वहीं चेयर पर बैठकर उसके साथ की स्मृतियों में खो गई। आज से तकरीबन सात साल पहले की बात है, लगभग एक सप्ताह होने को आया था।

आसपास होते हुए भी उसे लोगों के होने न होने का जैसे ख्याल ही नहीं अपने में कहीं खोई सी थी वो। दिनभर तो कमरे में तकिए को बांहों में जकड़ कर बैठे दिखाई पड़ती। अंधेरा होते छत के छज्जे पर खड़ी दिखाई देती जैसे किसी के आने का बेसब्री से इंतजार कर रही हो। पिंकी की ये हालत देख मैं थोड़ी हैरान तो थी लेकिन सोचा कुछ होगा तो बता देगी क्योंकि हमारे बीच सब ठीक चल रहा था। अरे ये क्या मैं तो आपको बताना ही भूल गई कि पिंकी से मेरा रिश्ता क्या है? मेरे ऑफिस में ही काम करती थी, काम को बड़ी ईमानदारी और मेहनत के साथ करती। उसको ज्वाइन किए लगभग नौ महीने हो गए पर उसका ऑफिस में मेरे सिवा कोई दोस्त नहीं बना था। इतना ही नहीं दिल्ली जैसे शहर में लड़कियां जब नई-नई आती हैं तो उन्हें एक दूसरे के सहारे की जरूरत होती है। अर्थात कोई ढंग का रहने का ठिकाना और साथी। छ: महीने से ज्यादा हो गए उसके साथ एक ही घर में रहते हुए। पिंकी साधारण नैन-नक्श की बहुत ही शांत और सुलझी हुई लड़की है, उसके साथ मतभेद या किसी प्रकार के झगड़े का तो मतलब ही नहीं बनता। ऑफिस के बाद का समय हम दोनों का कब गुजर जाता पता ही नहीं चलता। इन नौ महीने में पहली बार पिंकी को इस प्रकार देख रही थी।
खाने की बोलती तो भूख नहीं है अभी आप खा लीजिए। टीवी के नाम से नींद आने लगती। रात में उसकी रोने की सिसकियां सुनाई देती। मैंने सुबह उठकर पूछा, '' पिंकी क्या बात है सब ठीक तो है? और घर में सब कैसे हैं? ''उसने बिना मेरी तरफ देखे ही जवाब दिया, जी दीदी सब ठीक है। फिर मैंने भी ज्यादा नहीं पूछा। तीन नवंबर की शाम ऑफिस से आकर मैंने किचिन में काम करने के साथ ही पिंकी की गतिविधिओं पर नजर भी रख रही थी, बिना कुछ बोले। रात में फ्री हो उसके रूम पहुंची। वह तकिये को बांहो में जकड़े उसी ध्यान मुद्रा में बैठी रही उसे मेरे रूम में पहुंचने की आहट तक महसूस नहीं हुई। मैं भी कुछ अनहोनी की आशंका से उसके पास बैठी। हमेशा की तरह बड़े प्यार से उसके कंधे को पकड़ कर कहा, ''बेटा क्या बात है आज कल तो तुम किसी तीसरी दुनिया में ही रहती हो, ऐसा लगता जैसे किसी मेले से लौटकर कोई पिंकी की हमशक्ल मेरे साथ आ गई हो पिंकी नहीं, मेरी पिंकी तो ऐसी नहीं थी, वो तो लगभग हर बात मुझसे शेयर कर लेती थी पर यहां तो माजरा कुछ और ही है।''उसने हड़बड़ा कर जवाब दिया, नहीं शिल्पी दीदी ऐसा कुछ नहीं है।" मैंने प्यार से उसके सिर पर हाथ फेरते हुए कहा, अब सचसच बताओ चल क्या रहा है इतने दिनों से? वो बिना कुछ बोले बच्चों की तरह मुझसे लिपटकर रोने लगी। जैसे-तैसे उसको चुप कराया। पूछा अब बताओगी कि मेरी बहादुर पिंकी को हुआ क्या है? उसने बताना शुरू किया तो मैं चुपचाप सुनने लगी और साथ ही उसके चेहरे पर निरन्तर आते जाते भाव को भी पढ़ रही थी। लंबी सांस खींचकर बोली, शिल्पी दीदी दिन और तारीख बार-बार लौट आते हैं हमें तड़पाने के लिए, रुलाने के लिए ... पर नहीं लौटते तो वो हसीन लम्हें, वो सपनों की तरह गुजरा वक्त और वो जिसके आसपास मेरी दुनिया घूमती थी। दो साल पहले की ही तो बात है लेकिन ऐसा लग रहा जैसे अभी-अभी सबकुछ हो रहा हो। आर्मी ज्वाइन की थी उसने सियाचीन में पोस्टिंग थी। सालों की चाहत अक्टूबर में पूरी हुई थी जब वह दो महीने की छुटटी लेकर आया था। दो दिल एक साथ धड़के थे। मैंने सुनील के कंधे पर सिर रखकर सपनों की दुनिया का सफर शुरू किया था। दो महीने कब पूरे होने आए थे पता ही नहीं चला। और फिर दो नवंबर को अपना जन्मदिन मनाकर कल आने की कह कर निकला। जाते जाते कितना खुश था वो। तीन नवंबर को मैं बावरी होकर उसका इंतजार कर रही थी। रात के नौ बजे दरवाजे पर बैल बजी। मैंने भागकर दरवाजा खोला। सामने सुनील खड़ा था, आंखे लाल थी, चेहरा मुरझाया, उसे देखकर ऐसा लग रहा था जैसे जमाने भर की उलझने अपने सिर पर रखकर लाया था। दरवाजा बंद कर मैं उसके पीछे-पीछे कमरे में आई थी। उसे कुछ समझ नहीं आ रहा था। बिना कुछ बोले उसने मुझे सीने से लगा लिया। अपनी आंखों में आए आंसुओं को मुझसे छिपाकर पोंछने की कोशिश कर रहा था। मैंने किसी तरह उसको सहारा देकर बेड पर बिठाकर उसकी आंखों में आंखे डालकर पूछा, तुम ठीक हो? हुआ क्या है? उसने बिना कुछ जवाब दिए मुझे फिर सीने से लगा लिया। काफी देर बाद उसे नार्मल कर पायी थी। वो मुझे ऐसे देख रहा था जैसे मुझे उससे कोई छीन रहा है और वो लाचार कुछ नहीं कर पा रहा है। बड़ी देर में बोला था पिंकी सर दर्द से फटा जा रहा है। मैं जैसे ही ड्रेसिंग टेबल से सर में मसाज करने के लिए तेल लेने के लिए उठी। कि उसने पीछे से मेरा हाथ पकड़ लिया प्लीज तुम मुझे छोड़कर कहीं मत जाओं। तुम्हारे बिना मेरा दम घुटता है। मैंने उसके हाथ को दोनों हाथों में लेकर कहा, मैं तुम्हें छोड़कर कहीं नहीं जा रही हूं, बस तुम्हारे सिर का इलाज करती हूं ताकि तुम आराम से सो सको। उसको बेड पर लिटा पास ही कुर्सी डालकर धीर-धीरे उसके सिर को दबाते हुए ऑयलिंग करने लगी। और धीरे-धीरे उसके मन में चल रही उथल पुथल को शांत करती रही। जब उसे राहत हुई तो मैं उठ खड़ी हुई थी। शहर में यूं तो अमित के कई यार दोस्त थे पर अपने दिल की बात किसी से कह पाए ऐसा मेरे सिवा कोई नहीं था। मैं उसकी महबूबा होने के साथ ही टीचर, दोस्त और एक छोटी बच्ची यानि कि जब उसको जिसकी जरूरत होती बन जाती थी। जब मैं बचपने करती तो वो देखदेख कर हंसता रहता। जब मैं बीमार पड़ती थी तो उसकी हंसी और रातों की नींद गायब हो जाती थी। तभी मैंने बीच में पिंकी को टोकते हुए कहा, उस रात हुआ क्या था? सुनील इतना परेशान क्यों था? वह बिना किसी तरफ देखे पत्थर की मूर्ति बनी बैठी ऐसे बताए जा रही जैसे अभी-अभी कोई मूवी देखी और उसकी कहानी मुझे सुना रही हो। बोली, दीदी मेरी माँ जब मैं सात की थी तभी मुझे मुझे पापा के भरोसे छोड़कर हमेशा के लिए चली गयी। पापा ने दूसरी शादी कर ली पर आने वाली माँ आज तक मुझे अपना नहीं पाई। घर में रोज रोज मुझे लेकर कलेश होता तो पापा ने मुझे होस्टल में डाल दिया। होस्टल में पापा और जब तक दादी जिंदा रहीं मिलने आ जाती थी।
दादी के बाद तो जैसे मेरा घर होस्टल ही हो गया था। और उसी बीच बस मेरे पास एकलौता दोस्त या परिवार जो भी था ... सुनील ही था। दोस्ती कब प्यार में बदल गयी पता ही नहीं चला। मेरे घर में मेरी शादी की बात चल रही थी। उसने अपने घर में मुझे लेकर बात की थी। घर वालों ने क्या कहा ये तो मैंने नहीं पूछा, लेकिन इतना पता था कि हां नहीं बोला। आंसूओं ने पिंकी के गालों पर एक लकीर सी बना ली जैसे वर्षों से भरे पानी को निकलने का रास्ता मिल गया हो। बीच-बीच में वह आंसूओं पोंछती भी जाती थी पर जो दो साल से रुके हो वो आज कैसे रुक सकते हैं। पिंकी की चुप्पी को तोड़ते हुए मैंने पूछा, फिर क्या हुआ? बोली, फिर मैंने ऑफिस से आठ नवंबर तक की लीव ले ली। इन चार दिनों के हरएक पल को हमने साथ में बिताया। उसकी पसंद का खाना बनाना, पैंकिंग से लेकर उसके हर एक छोटे काम को अपने हाथों से करती। वो इन सारे कामों में मेरी मदद करता। हम बच्चों की तहर हंसते, लड़ते रहते। कई बार रात में मेरी नींद खुलती तो देखती वो सामने बैठा हुआ मुझ देख रहा है। मैं उठकर उसको जबरदस्ती सोने के लिए लिटाती तो वो एक ही बात बोलता, यार तुम सोओं और मुझे मेरी नन्ही परी को देखने दो। अगर कहीं सीमा पर दुश्मन की गोली का टारगेट में ही हुआ तो मेरी नन्हीं परी कैसे पहुंचेगी वहां? मैं कैसे देख पाऊंगा उसे? मेरी उंगली उसकी पूरी बात सुने बगैर ही उसके होठों पर टिक जाती। और मैं गुस्से का नाटक कर उसे डांट लगाते हुए कहती- मुझे पता है तुम सौ दुश्मनों पर एक साथ भारी पडऩे वालों में से हो। भगवान करें तुम पर आने वाली हर मुसीबत मेरे सिर से गुजरे। और हाँ अगर वापस से बोला तो मैं तुमसे बात ही नहीं करूंगी। इस तरह इन चार दिनो में हम दोनों ने एक दूसरे के साथ आधी उमर गुजार दी थी। न जाने कितनी बार एक-दूसरे को ध्यान रखने की हिदायतें दी थीं। और फिर जुदाई का वक्त आ गया ये चार दिन कैसे गुजर गए पता ही नहीं चले। उसको स्टेशन तक छोडऩे गई। स्टेशन जाते वक्त रास्ते भर मैं उदास तो थी लेकिन उसके सामने जबरदस्ती रास्तों पर बनी बड़ी बिल्डिंगस को दिखाने के बहाने नजरे चुरा रही थी और वो सिर्फ मुझे देखे जा रहा था। जब वो ट्रेन में चढ़ गया। तो मैं पीछे मुढ़कर आंसू पोंछ ही रही थी कि उसने ट्रैन से उतर गले लिया। बोला, पिकीं वादा करो तुम मेरा इंतजार करोगी। पिंकी मेरा साथ मत छोडऩा मैं जल्द तुम्हें अपने साथ लेने लौटूंगा। और इस बार मेरी हिम्मत ने जवाब दे दिया, मैं उससे भी ज्यादा भावुक होकर बोली, ''तुम इस जन्म की बात करते हो मैं तुम्हें अगले सात जन्म तक नहीं छोड़ूगी। तुम मुझसे चाहे कितने भी दुखी हो जाओ तब भी नहीं समझे मेरे बुद्धू। ट्रेन की बिसिल बजी और वह मेरे माथे को चूमकर जंग जीतने वाली मुस्कराहट होठों पर लिए ट्रेन में चढ़ गया। सुनील दूर तक गेट पर खड़ा हाथ हिलाता रहा और मैं जब तक ट्रेन आंखों से ओझल नहीं हो गई वहीं खड़ी रही। मुझे क्या पता था कि ये सात जन्म का वादा मुझे इतना मंहगा पड़ेगा। उसके जाने का गम था लेकिन जिंदगी में उससे प्यार करने की ख़ुशी कहीं ज्यादा। वहां पहुंचकर उसने डयुटी ज्वाइन कर ली। 13 नवंबर को मेरी लास्ट टाइम बात हुई थी। उसके बाद उसका फोन नहीं लगा। उसके दोस्तों का फोन ट्राई किया, किसी से संपर्क नहीं हुआ न जाने दिल बड़ा घबरा रहा था तो मन ही मन उस पर गुस्सा भी आ रहा था। उसकी बातों को याद करती तो कभी उसके चीजों को चूमती। इस तरह बैचैनी में दो दिन गुजर गए न जाने कितनी दफे उसका नंबर डायल किया लेकिन हर बार नॉट रिचेबल ही बता रहा था। शाम को मन नहीं लग रहा था तो टीवी चलाकर न्यूज़ देखने बैठी। टीवी पर बे्रकिंग न्यूज चल रही थी ...सियाचीन में 6 जवान शहीद हो गए हैं। मेरी सांसे रुक गई थी, हालात काटो तो खून नहीं जैसी थी। बारबार सुनील की सलामति की दुआ किए जा रही थी। न जाने कितनी मन्नतें वहीं बैठे-बैठे मांग ली थी। पर मेरा भगवान मुझसे रूठ गया। उसने मेरी एक न सुनी। उन 6 में सुनील का नाम भी टीवी स्क्रीन पर दिखाई दिया। पागलों की तरह जमीन पर गिर पड़ी एक सेकेण्ड में ही मेरी दुनिया उजड़ गयी। सपनों का महल ढह गया। रात भर भगवान से रो-रोकर भीख मांगती रही कि हे भगवान मेरे सुनील को सही सलामत लौटा दो ये खबर झूठी साबित कर दो। इतनी लंबी और भयावह रात कटने का नाम ही नहीं ले रही थी। जैसे-तैसे सुबह हुई और मैं मेरी एक दोस्त के साथ दौड़ती भागती दिल्ली आई। सुनील को ढूढऩे, दौड़कर उसके उसके गले लगने। सुनील के घर उसकी चचेरी बहन की शादी में आई थी। उसके घर के बाहर लंबी भीड़ लगी थी। उसकी डेड बॉडी आ चुकी थी। सबका रो-रो कर बुरा हाल था। पर इस सबसे बेखबर सुनील ऐसे लेटा था जैसे कि कोई हसीन ख्वाब देख रहा हो। जो मुझे देखकर दौड़ पड़ता था आज उसे मेरे आने की आहट तक नहीं थी। जब तुम घर आओगी ये करूँगा, ऐसा होगा, ये दिखाऊंगा, उससे मिलना और आज वो शांत लेटा था, उसकी बातें मेरे कानों में गूंज रही थी। सुनील की माँ ने मुझे देखते ही पहचान लिया था। उस वक्त शायद वही मेरे दर्द को समझ सकीं थी। माँ के गले लगकर तो आंसू बहा लिए पर सुनील पूरी तरह जिसकी पत्नी थी लेकिन समाज के सामने अभी नहीं। मेरा सब कुछ उस से शुरू हो उसी पर खत्म होता था उसे छू तक नहीं पाई थी। जिसे मेरी आँख में एक आंसू बर्दास्त नहीं था शिल्पी दीदी उसने आंखें खोलकर देखा तक नहीं। उसके बाद महीनों बिस्तर पर रही। घर वालों ने शादी के लिए प्रेशर बनाया तो एक दिन सब छोड़छाड़ के आ गयी दिल्ली सुनील से किए वादों को पूरा करने। जब सुनील से मिलने का मन करता है तो आंटी से मिल आती हूं क्योंकि सात जन्मों तक इन्तजार करने का वादा जो किया था! अंकल - आंटी के पास भी तो मेरी तरह सुनील के अलावा कुछ नहीं है और उसके अगले दिन वो हमेशा के लिए जॉब और मुझे छोड़ सुनील के अधूरे कार्यों को पूरा करने निकल गयी थी।
आज इतने सालों बाद उसे देख रही थी। उसने अब तक कहीं शादी नहीं की थी जो हक सुनील उसे देने वाला था वो उसके माँ -बाप ने दे दिया। हालांकि माँ-पापा ने बहू नहीं बेटी बनाने की बहुत ज़िद की लेकिन पिंकी के सामने वो हार गए। माँ -पापा ने बसीयत लिख कर पिंकी को बहु और पिंकी के गोद लिए बेटे को अपना पोता होने का क़ानूनी अधिकार दे दिया। इस तरह माँ-पापा को पिंकी के रूप में अपना बेटा और पोता मिल गया वहीं पिंकी को परिवार का प्यार। आज वो गर्व से शहीद की विधवा बनकर सुनील के अधूरी जिम्मेदारियों को पूरा कर रही थी। Reference- दीप्ति मिश्रा "Chulbuli"(लेखिका) अपने भाव को नीचे कमेंट करके बात करें। चाहे तो लाइक भी करें।
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