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काश तुम थोड़ा और ठहर जाती हिंदी कहानी

काश तुम थोड़ा और ठहर जाती हिंदी कहानी 

जानती हो आज फरवरी की वही 8 तारीख है, जिस दिन तुम मेरे जीवन मे आयी थी, वैसे मुझे तो इस बार भी हर बार की तरह ये याद ही नही थी वो तो अचानक से फोन पर नज़र पड़ी। वैसे भी कुछ तारीख जिनसे अपना सा जुड़ाव हो उन पर ध्यान भी जल्दी ही आकर्षित हो जाता है न, पर इस बार न जाने क्यों? इस तारीख की मुझे न खुशी न कोई दुख है, बस मन के दो हिस्से हैं, जिनमे से दोनो की अपनी अपनी व्यथा है।



मन के एक कोने में एक खालीपन सा है जो कहता है कि काश ! अब हम अपने वो सारे सपने पूरे कर पाते जो तुमने जाने कितने ही सालों से बुने थे। तुम हमेशा से चाहती थी न कि हम अपनी सब जिम्मेदारियों को निभाने के बाद केवल अपने बारे में सोचेंगे, हम हर उस जगह जाएंगे जहां जीवन की भागदौड़ में चाह कर भी नही जा पाए। हम अपने वो सारे शौक पूरे करेंगे जो बच्चो के शौक पूरे करने में कहीं गुम हो गए। जानता हूँ तुम्हे अपने शरीर मे कष्ट आज से नही बल्कि पिछले 17-18 सालों से था, पर तुमने तो कभी इसे गम्भीर लिया ही नही। हाँ खाने पीने में कभी तुमने कोई बदपरहेजी नही की, लेकिन शरीर मे एक रोग लगने के बाद उसपर ध्यान देना भी बहुत जरूरी हो जाता है न। जो तुम या मैं दोनो में से कोई कर ही नही पाया।

आज भी मुझे याद है जब मैं रोज सुबह तुमसे पूछा करता था आज शरीर के किस हिस्से में दर्द है और फिर हम दोनों ही खिलखिला पड़ते थे, जबकि ये तुम अच्छे से जानती थी कि तुम्हारी बीमारी अंदर ही अंदर तुम्हे कितना खोखला कर रही थी। इसमें एक तरह से गलती तुम्हारी भी है, तुमने कभी जिद भी तो नही की किसी अच्छे डॉक्टर को दिखाने की या ये कहूँ कि तुमने की भी थी, पर उतनी जबरस्ती नही कि मैं उसे गंभीर समझता। जबकि हम कभी-कभी कुछ नए डॉक्टर को दिखाने जाते भी थे पर कभी कोई फायदा ही नही हुआ और जब तक हम गम्भीर हुए, तब तक तुम्हारी बीमारी इतनी गम्भीर हो चुकी थी कि उसने तुम पर अपना कब्जा जमा लिया।

कई बार मैं खुद को दोषी भी पाता हूँ तुम्हारा कि मैंने तुम पर काम का बोझ जरूरत से ज्यादा डाल दिया,।लेकिन तुम्हे कभी इसकी शिकायत नही थी, क्योंकि तुम जानती थी कि मेरे अकेले के लिए ये असम्भव है। तुम मुझे हर परिस्थिति में अपने साथ नज़र आई। चाहे पैसों की तंगी थी या समय की मार, तुमने हर परिस्थिति में मेरे साथ वहन किया और कभी किसी चीज का कोई एहसान भी नही जताया। फिर धीरे-धीरे तुम मेरे साथ नही मुझे अपने पीछे दिखने लगी। जहाँ तुम्हारे अंदर साथ देने की पूरी इच्छा शक्ति थी पर कहीं न कहीं तुम खुद, बीमारी के सामने कमजोर हो रही थी। लेकिन यकीन करो उस समय भी तुम्हारा मेरे पीछे होना मेरे लिए बहुत मायने रखता था। जब कभी भी मै निराश होता था न, पीछे मुड़कर देखने पर मैंने तुम्हें हमेशा अपने लिए खड़ा पाया। भले ही तुम अपने पैरों पर खड़ी नही हो पा रही थी पर मेरे साथ खड़ी थी।
अब सोचता हूँ कि शायद मेरे मन का दूसरा कोना सही कहता है कि अच्छा हुआ तुम चली गयी। चली गयी खुद को अत्यधिक कष्टों से मुक्त करके ! क्योंकि तुम जानती थी कि तुमसे जुड़ा हर एक शख्स, तुम्हे कष्ट में नही देख पायेगा क्योंकि सबने अपने-अपने स्तर पर भरपूर कोशिश की तुम्हे बचाने की, मैंने भी ! जानती हो, मैं घण्टो मंदिर में इसी आशा में बैठा रहता कि शायद भगवान मुझ पर तरस खाकर ही सही पर तुम्हे बख्श दें। लेकिन मैं गलत था, शायद तुमने मेरी लम्बी उम्र की पूजा और व्रत किये पर खुद के लिए कभी कुछ मांगा ही नही ! और तुम्हारी वही पूजा मुझ पर भारी पड़ गयी। तुम इस बात से अनजान थी कि अगर तुम चली गयी तो हम नही केवल मैं रहूंगा, अकेला बिलकुल अकेला
!
उस आखिरी रात भी जब मैंने तुम्हारे लिए चाय बनाई थी न, तब मैं भी कहाँ जानता था कि ये हमारी आखिरी चाय होगी और अब से चाय केवल मैं पियूँगा, हम नही, मैं अकेला! खुद में हम को तलाशता सा! उस रात ही मुझे तुम्हारी तबियत में गड़बड़ होने का आभास हो गया था, लेकिन फिर भी विश्वास था कि शायद कुछ दिन और मैं तुम्हे रोक पाऊँ। उस दिन जब मुझे पता चला कि तुम अब नही रही मुझे समझ ही नही आया "मैं क्या करूँ...? रोऊँ! घुट जाऊं! या फिर बच्चों को देखूं!" उनकी शक्ल देखकर पता नही कहाँ से मुझमे इतनी हिम्मत आयी कि मैंने खुद को घोट लिया, उस दिन मैं तुम्हारी मांग में दूसरी औऱ आखिरी बार सिंदूर भरते हुए भी नही रोया। जबकि मैं जानता था पहली बार सिंदूर भर कर तुम जीवन भर के लिये मेरी हुई थी और इस बार सिंदूर भर कर जीवन समाप्त कर ईश्वर की। पूरे 13 दिन एक मशीन की तरह मैंने खुद को व्यस्त रखा, लेकिन तेरहवें दिन एक-एक कर जब सब जाने लगे
उस दिन मेरे सब्र का बांध टूट गया और आंसू उस बांध को तोड़ते हुए मेरी इच्छा के विरुद्ध भी बह निकले। मुझे सबने बैठा कर समझाया और थोड़ी देर आराम करने को कहा। मैं जाकर लेट गया शायद मैं भी यही चाहता था, शायद मैंने खुद को केवल उसी एक पल तक के लिए घोट रखा था। उस दिन से आज तक मैं कभी रोया नही। कभी अगर ऐसा हुआ भी तो वो मेरे आंसू दगा कर गए, जो मेरे कहे अनुसार चले ही नही। क्योंकि मैं तो तुम्हारे जाने के दुख में उसी दिन जी भरकर रो लिया था जब तुम एक बार हॉस्पिटल में लगभग पूरी तरह सिकुड़ ही गयी थी।
उस एक पल में सबकी तरह मुझे भी लगा कि शायद मैं आज तुम्हे खो दूंगा पर ईश्वर की कृपा से ऐसा नही हुआ, भले ही उस दिन के बाद तुम बहुत दिनों तक गफलत में रही, और उस गफलत में भी तुम्हे याद था कि मेरे लिए तिलकुट में बुरे और तिल का अनुपात क्या हो...! मुझे हल्के मीठे का बेहद पसंद है, बस तुम्हारे वो शब्द मेरी आंखों से आंसुओं की एक बाढ़ ले आये। उस दिन से ही मैंने ख़ुद को तुम्हे खोने के लिए तैयार कर लिया था। तुम्हे याद है...नही..नही ! तुम्हे तो पता भी न होगा जब पहली बार तुम्हारा डियलिसिस हुआ था, तुम्हारे दर्द में तड़पने की आवाज़ मुझे बाहर तक आ रही थी और मैं चाहकर भी कुछ कर ही नही पा रहा था। उस समय मैं वहां से चला गया था...दूर...बहुत दूर ! जहां मुझे तुम्हारे दर्द की आवाज़ न सुनाई दे, जहां केवल मैं उसे अपने अंदर महसूस कर पाऊं !
जैसे एक नया जीव दुनिया मे आने के लिए पूरे नौ महीने और कुछ दिन लेता है न, वो जीव अंदर ही अंदर हर पल, हर क्षण तिल-तिल कर बढ़ता रहता है, वही कुछ तुम्हारे साथ हुआ। उन 9 -10 महीनों में तुम भी अंदर से तिल-तिल कर घट रही थी। अंदर ही कहां बाहर से भी तो, याद है, मुझे एक ही दिन में तुम्हारा आंखों से न देख पाना, पैरो से लाचार तो तुम हमेशा से ही थी। फिर तुम्हारा दिल जिसकी वाल भी कमजोर हो गयी थी और किडनी ! खैर वही तो सब की जड़ थी बस इसी तरह एक दिन तुम घट कर पूर्ण रूप से विलुप्त हो गयी !
आज भी जब कभी पानी पीता हूँ तब भी रह रहकर तुम्हारा ख्याल आता है कैसे तुम एक डेढ़ साल तक बिना पानी पिये रही होंगी क्योंकि दिन में एक से दो गिलास पानी पीना भी कोई पीना थोड़े ही है वो भी सिर्फ एक गिलास तो दवाई के साथ ही, पर फिर सोचता हूँ कि शायद अब तो तुम्हारे साथ ऐसी कोई बंदिश नही होगी न।फिर अचानक से ख्याल आता है कि अब तुम्हे कहाँ कोई दर्द कोई बंदिशें होंगी और अचानक ही पानी मेरे हलक में सूख कर रह जाता है।
बस अब तो यही सोचता हूँ...काश ! अपने सपने पूरे करने को तुम फिर से आ जाओ और मैं, मैं से हम हो जायें!
Reference- नेहा भारद्वाज
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