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हिंदी कहानी-अधूरे सपने कभी-कभी ऐसे भी पूरे होते है

हिंदी कहानी-अधूरे सपने कभी-कभी ऐसे भी पूरे होते है 


उसकी मासूमियत एक नज़र में ही आंखों में समा गई। वह एक मध्यमवर्गीय परिवार से रही होगी, लगभग पंद्रह वर्ष की वो कन्या मेरे बेटे अदित से एक वर्ष छोटी ही थी। मेरे बेटे की सहपाठिनी थी वो इसी कारण उस से मुलाक़ात हुई।
हिंदी कहानी-अधूरे सपने कभी-कभी ऐसे भी पूरे होते है

अधूरे सपने कभी-कभी ऐसे भी पूरे होते है 


उसका नाम भूमि था। बड़ी-बड़ी आंखे, काले, घने, लम्बे बाल फूल सा होंठ और ऊंची नाक, रंग में सांवली थी पर सुंदरता ऐसी की कहने के लिए शब्द ही न हो उसकी व्यक्तित्व से काफ़ी हद तक प्रभावित हुई मैं।
मन ही मन मैं चाहती थी वो मेरे घर मेरी बहु के रूप में आये पर दोनों की चंचलता, मासूमियत देखकर लगता ये तो अभी बच्चे हैं, अभी तो काफ़ी समय है। समय आने पर इसपे गौर करेंगे ये सोचकर मैं इस बात को भूल सी गई। भूमि का मेरे घर आना भी पहले से काफ़ी कम हो गया। फिर अदित के पिता का ट्रांसफर भी जमशेदपुर से केरल हो गय। और मेरी ये गुप्त इच्छा मन के किसी कोने में दबी सी रह गई।
फिर भी मन को इस बात की संतुष्टि थी कि अदित के पास तो भूमि का पता होगा ही जरूरत पड़ने पे उसी से मांग लिया जाएगा।
करीब दो साल बाद एक शाम अचानक जब मैंने अदित को भूमि के बारे में पूछी, तो वो हैरान हो गया की मुझे अब भी भूमि याद हैं ?.आखिर मैं कैसे भूल जाती भूमि को भूलना चाहती तो भी नहीं भूल सकती आखिर वो मेरे भविष्य के सपने में एक महत्वपूर्ण शख्स बनकर शामिल है।
लेकिन ये जानकर बहुत दुःख हुआ कि अदित के पास भूमि के मोबाइल नंबर के अलावा कुछ भी नहीं था और दो वर्ष के अंतराल में वो नंबर भी बदल चुका था। जी में आया कि दिल खोलकर अदित को डांट लगाऊं, लेकिन किस आधार से। भूमि को अपने घर की बहू बनाने की ये गुप्त इच्छा तो मैंने अदित से भी नहीं कही फिर उसे कुछ भी कहने के लिए मेरे पास उपयुक्त शब्द कहा से आते। जमशेदपुर से केरल आने का ये मेरा सबसे बड़ा दुःख था।
फिर लगभग तीन साल बाद अदित के पिता ने कही से एक गरीब परिवार की तीसरी पुत्री को अदित के लिए पत्नी चुना, सोचा गरीब लड़की पूरे परिवार को सिमटा के रखेगी।
दिखने में सरल थी और शरीर के नाम पे हड्डियों का ढांचा भर था। खैर अदित और उसके पिता के रजामंदी के अनुसार विवाह तय हुआ। पूरी योजना को लेकर विवाह संपन्न हुआ। लाल जोड़े में तैयार होकर बेटे की बहू घर आई और मैंने उसे अदित की सारी जिम्मेदारी सौंप दी ।
बहु जरूरत से ज्यादा सीधी थी घर के सभी कामों को निपटाकर अपने कमरे में जा बैठती। जरूरत पड़ने पे ही मुझसे बात किया करती। सबकुछ होते हुए भी मन सुना सा था फिर 6 महीने बाद एक नई खबर ने घर के वातावरण को खुशनुमा कर दिया मेरा लाडला अदित कुछ महीनों बाद खुद बाप बन ने वाला था।
बहु को भरपूर पोषण और आराम देने के लिए मैंने यथासंभव ज़िम्मेदारी उठायी। 9 महीने बाद एक रात मैं दादी बन चुकी थी अदित बाप और उसके पिता दादा, दो पल की मुस्कान उम्र भर का दुःख देकर चला गया।
प्रसव पीड़ा को मेरी बहु सह नहीं पाई एक छोटे व कमज़ोर पुत्र को जन्म देकर खुद विदा हो गई। अदित की मुस्कान पता नहीं कहा खो गई।
अब फिर मेरे पास एक नई चुनौती थी, फिर ईश्वर ने एक अच्छी माँ बनने की परीक्षा लेना आरंभ किया। बेटे से मेल खाता हुआ पोते का नाम अर्पित पड़ा। इस अस्वस्थ बालक को लेकर मैं फिर चल पड़ी अपने अतीत में जब अदित का जन्म हुआ था उस वक़्त को याद करती और अपने पोते का भी वैसा ही ख्याल रखती।
करीब 6 महीने पश्चात हम लोगों का पुरी यात्रा जाना तय हुआ। सोचा जगन्नाथ भगवान से अपने बेटे की खोई मुस्कान को मांगने में सफ़ल हो जाऊं। यात्रा सफ़ल रही लेकिन वापस लौटते वक्त एक अजीब सा हादसा हुआ 6 साल पहले भूला हुआ वो अधूरा सपना याद आ गया। वही मासूम, शरारती, चंचल भूमि मेरे सामने थी। ट्रैन में हमारे आगे वाले सीट पे बैठी थी और उसके साथ उसके माता पिता भी थे।
अदित को पुरानी दोस्त मिल गयी आज कई महीनों बाद मैंने उसे खुलकर हँसते हुए देखा। भूमि की माँ के साथ मेरी अच्छी दोस्ती हो गई बातों-बातों मैं उन्हें अदित के अतीत के बारे में बता चुकी थी। भूमि को जब पता चला की अर्पित अदित का बेटा हैं और उसकी माँ का स्वर्गवास हो गया हैं तो उसने तो जैसे अर्पित को अपना बेटा ही मान लिया वो उसके साथ पूरी तरह से घुल मिल गयी।
सबकुछ ठीक था पर जब मैंने पूछा कि भूमि अब तक अविवाहित क्यों हैं? तो उसकी माँ के आँखों में आंसू आ गए फिर उन्होंने मुझे ऐसी बात बताई जो मैं कभी सोच भी नहीं पाती। उसने बताया कि भूमि कभी "माँ" नहीं बन सकती। उसके गर्भाशय में कोई कमी है जिसका इलाज़ नहीं हो सकता ऐसा डॉक्टरों ने साफ़-साफ़ बोल दिया है। रिश्ते तो अनेक आये लेकिन हम ही लोग टाल देते रहे।
इतना कहते कहते भूमि की माँ फुट-फुट कर रोने लगी, मैंने किसी तरह से उनको सम्भाला लेकिन इस भयानक खबर से मैं भी विचलित हो गई। आखिर ये कैसा न्याय हैं ईश्वर का जो लड़की बेटी दोस्त हर रिश्ते को इतने अच्छे से निभाना जानती हैं फिर उसके साथ ऐसा अन्याय क्यों किया गया की वो दुनिया के सबसे अहम और सच्चा रिश्ता माँ ही नहीं बन सकती।
दो दिन बीत गए भूमि अपने घर जमशेदपुर जा चुकी थी और हमलोग केरल आ गए। लेकिन चाहकर भी मैं इस बात को भूल नहीं पा रही थी। आखिर फ़िर से मेरे मन में एक आस जगी । मेरे घर में तो पोता है ही बस कमी एक बहु की है और फ़िर अर्पित को भी एक माँ तो चाहिए ही, आखिर मैं कब तक संभाल पाउंगी। अदित भी अभी एक नवयुवक है उसे भी तो एक पत्नी की कमी खलती होगी। भूमि को भी तो एक योग्य वर चाहिए बिन ब्याही उसका भविष्य कैसा होगा। कब तक जी पाएगी उसकी मां बिन ब्याही बेटी को लेकर।
आखिर मैंने ठान लिया कि भूमि का योग्य वर अदित ही होगा और इस बार मैंने ये बात अदित और उसके पापा को भी बता दिया। दोनों ही इस बात से सहमत थे बस अदित थोड़ा घबरा रहा था, की कही भूमि अर्पित के साथ सौतेला व्यवहार न करें। पर मुझे पूरा बिस्वास हैं भूमि ऐसा नहीं कर सकती आखिर मैंने भूमि को समझा है, परखा हैं। किसी भी हद तक भूमि एक बच्चे के साथ ऐसा अन्याय नहीं कर सकती।
अतः अदित का रिश्ता लेकर अदित और उसके पिता जमशेदपुर के लिए रवाना हुए, और संयोग से भूमि और उसके परिवार वाले भी इसके लिए तैयार हो गए। यहाँ तक कि उन लोगों ने तो विवाह की तिथि भी तय कर डाली।
मैं बहुत खुश थी। सम्पूर्ण रीति रिवाजों के साथ विवाह संपन्न हुआ। भूमि को अपने बहु के रूप में देखकर मैं संतुष्ट हो गई भूमि हमारे परिवार में बहुत जल्दी ही घुल मिल गई। और अर्पित को तो वो सगे बेटे से भी ज़्यादा प्यार देने लगी। अदित भी बहुत खुश था। अदित के पापा भी भूमि जैसी सर्वगुण सम्पन्न बधु पाकर धन्य हो गए। अर्पित अब पूरे 5 वर्ष का हो गया है। भूमि और अर्पित का रिश्ता सबसे अलग और प्यारा है। इस अनमोल भेंट के लिए मैं मेरी पहली बहु को ताउम्र धन्यवाद देती रहूंगी। कितना कम लेकर वो हमें कितना ज़्यादा देकर चली गयी।
Reference- Dipti Biswas(writer)
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