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एक सस्पेंस हिंदी कहानी ये लाल रंग

एक सस्पेंस हिंदी कहानी ये लाल रंग 

खून का रंग लाल क्यों होता है? खतरे का रंग भी गहरा लाल होता है और इसका मतलब क्या लाल रंग हमारे मन मे डर पैदा करने के लिए बनाया गया है? लाल रंग तो बहुत प्यारा होता है ना।" इतने छोटे से बच्चे के मुंह से ऐसी बातें सुनकर जिया घबरा गई। फिर डांटने के अंदाज में बोली "कल्पित बेटा ऐसी बात नही करते, ये सब किसने बताया"। लेकिन कल्पित ने जिया की बात को जैसे अनसुना कर दिया और खिड़की से बाहर झांकने लगा। शाम का समय, बस(bus) धूल छोड़ते हुए कच्चे-पक्के रास्ते मे आघे बढ़ रही थी और जिया अपने अतीत में पीछे जा रही थी।
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कितनी खुश थी मेघा दीदी जब कल्पित का जन्म हुआ था। जीजा जी ने बच्चे को हाँथ में लेकर कहा था,"ये किसी कल्पना जैसा लग रहा है, इसका नाम कल्पित कैसा रहेगा।" मैं और दीदी साथ मे मुस्कुरा रहे थे। दीदी ने कहा," ऐसा नाम रख रहे हो कहीं हमारा बेटा जीवन भर कल्पना करता ही ना रह जाए"।
छह साल बीत गए, दीदी और जीजा जी अपने छोटे से परिवार में बहुत खुश थे। उन्होंने कल्पित के लिए वो सब किया जो एक अच्छे मां-बाप को करना चाहिए था। पर होता वही है जो होना होता है- एक अकल्पनीय, असाधारण घटना जिसके बारे में आपने कभी सोचा नही होता, जिसके लिए आप तैयार नही होते।
एक बार दीदी और जीजा जी दुर्घटनाग्रस्त हो गए। जीजा जी तो उसी दिन चले गए। दीदी को कल्पित की फिक्र मरने नही दे रही थी । तीन दिन तक उनकी सांसे धीमे-धीमे चल रही थी। चौथे दिन मेरे हाँथ में कल्पित का हाँथ देते हुए दीदी ने वचन लिया कि मैं जीवन भर कल्पित की मां बन कर रहूंगी और मैंने मान लिया। फिर कोई दूसरा रास्ता भी नही बचा था। अब कल्पित ही मेरा जीवन है और इस रास्ते मे कोई बाधा ना आये इसलिए अब तक विवाह भी नही किया।
पीईईप.... पीईईप ..... बस की हॉर्न की आवाज से जिया की तंद्रा टूटी। कंडक्टर चिल्लाया ,"बस यहां आधा घंटा रुकेगी, सामने ढाबा है खाना खा लो"।
जिया ने देखा कल्पित सो रहा है। कितना मासूम कितना निर्मल, बिल्कुल दीदी पर गया है। उसने कल्पित को धीरे से हिलाया,"बेटा उठो खाना खा लो, अब बस रात भर कहीं नही रुकेगी, उठो कल्पित खाना खा लो।" कल्पित ने आँखे नही खोली सिर्फ होंठ से बुदबुदा दिया,"मौसी मुझे भूख नही लगी"।
जिया ने उसे उठाने की बहुत कोशिश की पर वह नही उठा अंत मे हार के जिया उसे अकेले छोड़ कर खाना खाने चली गयी और सोचा उसके लिए कुछ पैक करवा कर ले आउंगी। जिया सीट से उठ कर जाने को आघे बढ़ी तभी उसकी साड़ी किसी ने पीछे से खींच ली। जिया ने बनावटी गुस्से से कहा, "तूम फिर से शरारत करने लगे।" जिया पीछे मुड़ी उसका दिल मुँह को आ गया।
कल्पित तो दूसरी तरफ मुँह करके सो रहा है फिर किसने मेरी साड़ी पकड़ रखी है। शाम का समय था, अंधेरा हो गया था बस में हल्की रोशनी थी जिया ने गौर से देखा तो उसकी साड़ी सीट की हैंडल में फंस गई थी। उसने पल्लू को खींचा और आगे बढ़ गयी। ढाबे के पास पँहुचते ही उसने देखा एक महिला दूसरे तरफ मुंह घूमा कर बैठी है और उसने लाल साड़ी पहनी है। "पीछे से यह बिल्कुल दीदी जैसी लग रही है " जिया ने मन में सोचा और आघे से घूम कर उस महिला का चेहरा देख लेने की ललक उसके दिल मे बढ़ गयी।
लेकिन जितनी तत्परता से वह वहाँ गयी थी, हताश होकर, उतनी ही वेग से वापस लौट आयी। ढाबे पर उसने थोड़ा-बहुत खाया और दो बिस्किट और एक चिप्स ले कर बस में चढ़ गई। बस में इक्का-दुक्का यात्री ही थे अभी बस को छूटने में दस मिनट और बचे थे।
सीट के पास पहुंचते ही जिया ने देखा कल्पित वहां नही था। उसने जोर से आवाज लगाई," कल्पित, कँहा हो बेटा"। पर कोई आवाज नही आई। जिया ने कुछ पैसेंजरो से पूछा पर किसी को पता नहीं था। उसने बस का कोना - कोना छान मारा पर कल्पित कही नही मिला।
बेसुध होकर जिया बस से उतरी और आस-पास पागलो की तरह कल्पित को खोजने लगी। कुछ लोगो ने भी उसकी मदद की। कल्पित का कहीं कोई पता नही था। चारो तरफ अफरा-तफरी मच गई। उसे खोजते-खोजते आधा घंटा हो गया लेकिन वो नही मिला। बस भी रवाना होने के लिए तैयार थी। जिया का रो-रो कर बुरा हाल था। लोगो ने बहुत ढूंढा पर कल्पित कहीं ना मिला। जिया ने वहीं रुकने का फैसला लिया और बस अपने गंतव्य की ओर बढ़ गयी।
जिया वही ढाबे पर रखे कुर्सी में बैठ कर सुबकती रही। न कोई ढांढस बंधाने वाला, न कोई मदद करने वाला। "दीदी ने कितना भरोसा किया था मुझ पर, कल्पित को मेरे हाथों में सौंप कर ही तो वो चैन से सो सकी थी।" जिया ने अपने आंखों को हथेलियों से ढक रखा था लेकिन अश्रु धारा निरंतर बह रही थी जो हाथ से होते हुए कोहनी तक जा पंहुची थी। तभी कोई उसके कुर्सी से टकराया और जिया ने पीछे मुड़कर देखा। "ओये बेटी तू फिकर ना कर, ये सरदार तेरे बेटे को खोज के दम लेगा
"।
ढाबे का मालिक जिया को तसल्ली दे रहा था। "मैंने पुलिस को भी फोन कर दिया है, कोई ना कोई बंदा आएगा जरूर। लेकिन पुलिस स्टेशन भी बहुत दूर है, चालीस पचास मिंट तो लग ही जावेंगे"। पानी का ग्लास आगे करते हुए सरदार जी ने जिया को पानी पीने का इशारा किया। मुसीबत के घड़ी में किसी के मीठे बोल दर्द पर मरहम का काम करते है।
जिया फुट पड़ी, "भैया! कैसे भी मेरे बेटे को ढूंढ लो तुम जो मांगोगे मैं देने को तैयार हूं।" "वाहे गुरुजी की कृपा होगी तो अगले एक घंटे में तेरे बेटा तेरे साथ होगा पुत्तर"। सरदार जी ने दोनों हाथ सजदे में उठाया, आंखे बंद कर कुछ देर यूँही खड़ा रहा फिर बिजली की तेजी से जिया का हाँथ पकड़ा और सहारा देकर उठाया। "छोटू तू ढाबा संभाल, मैं हुन आया।" कमीज के बटन ठीक करते हुए सरदार जी आघे बढे और जिया बूत की तरह उनके पीछे हो ली। सरदार जी ने चार्जिंग लाइट लिया जो शायद सालो से इस्तेमाल नही की गई थी और आज के दिन का ही इंतज़ार कर रही थी। सरदार जी ने लाइट को पीछे से थपथपाया और वो जल उठी।
सरदार जी रोशनी में आघे बढ़ते जाते जिया उनका अनुसरण करती उसे रास्ते से कोई मतलब न था वो तो बस चल रही थी। उबड़ खाबड़ रास्ते, घांस वाले रास्ते, गिट्टी और फिसलन भरे रास्ते। गिरते-पड़ते जिया आगे बढ़ती जाती, कभी सरदार जी तो कभी जिया आवाज लगाती -कल्पित, बेटा कल्पित, कँहा हो।
अभी वो आधा मील चलकर आ चुके थे पर कल्पित का कोई नामो निशान नही था। थक हारकर वो वही एक पत्थर पर बैठ गए। "अब आगे तो जंगल है, लड़का इत्ती दूर तो अकेले आ नही सकता।" सरदार जी ने टॉर्च की रोशनी को दूर फेंकते हुए कहा। "चलो चल कर दूसरी तरफ ढाबे के पीछे तालाब वाले रास्ते में देखते है।"
जिया के भीतर अब बात करने की शक्ति नही रह गयी थी। वह उठ कर सरदार जी के पीछे चल पड़ी। दोनों उसी रास्ते से वापस आने लगे। तभी जोर से बरसात शुरू हो गयी और इतनी जोर से कि पल भर में ही हर तरफ पानी ही पानी हो गया। दोनों एक टूटे घर से आड़ में खड़े हो गए ।
बिजली भी कड़कने लगी। सरदार जी चिल्लाये ,"इस तरफ एक छोटा होटल है, चलो वहाँ बरसात रुकने तक खड़े होने की जगह मिल जाएगी।" दोनों भागते हुए उस छोटे से होटल के पास पहुँचे। वहाँ इक्का-दुक्का ट्रक खड़े थे और चारपाई पर पड़े-पड़े ड्राइवर सुस्ता रहे थे। पर इस असामयिक वर्षा ने उनको होटल के छत के नीचे सहारा लेने पर मजबूर कर दिया था।
सरदार जी जिया का हाँथ पकड़े, भागते हुए होटल के पास आये और छत के नीचे खड़े हो गए। बरसात अब कुछ हल्का हुआ। जिया ने सरदार जी से रुंधे हुए आवाज में कहा "भैया ! ढाबे पर पुलिस आ गयी होगी हमे वहां पहुंचना होगा।" वो दोनों चलने को तैयार थे पर तभी जिया को एक जानी - पहचानी रोने की आवाज सुनाई दी। "हां, कल्पित ऐसे ही तो रोता है, जब उसकी कोई जिद पूरी नही होती। अभी कल ही तो जिद कर रहा था और ऐसे ही रो रहा था, बिल्कुल वही आवाज।" यही सोचते हुए जिया दौड़ कर होटल के अंदर घुसी और देखा कल्पित खाट पर बैठा रो रहा है और एक बीस-बाइस साल का लड़का बिस्किट और पानी लिए वंहा खड़ा है।
कल्पित ने जिया को देखा और लपक कर जिया से जा लिपटा। जिया के आंसू जो खत्म हो चुके थे ना जाने फिर से कैसे बहने लगे। दोनों बिना कुछ कहे कुछ देर युहीं लिपट कर रोते रहे। फिर कल्पित ने रुंधे हुए आवाज में कहा, "मौसी आप मुझे यहाँ बैठा कर कहाँ चली गयी, मैं कब से आपका इंतजार कर रहा था।" "नहीं बेटा तुम बस में सो रहे थे, मैं खाना खाने नीचे उतरी जब लौट कर आई तो तुम वहां नही थे। तुम यहाँ कैसे आये? तुम बस से नीचे क्यों उतरे बेटा? तुम्हे कुछ हो जाता तो मैं क्या जबाब देती दीदी को।" जिया ने कल्पित को ऐसे पकड़ रखा था जैसे अब वो कभी उसे अपने से अलग नही करेगी।
"बहन, बच्चा डरा हुआ होगा। चलो यहां से बाकी बातें बाद में पूछ लेना।" सरदार जी ने टॉर्च को अपने हथेली से ठोकते हुए कहा और टॉर्च भी जलने लगी। तीनो धीरे-धीरे आगे बढ़ने लगे। "मौसी आपने तो लाल साड़ी पहनी थी फिर कब बदल ली?" कल्पित ने पानी से भरे हुए छोटे गड्ढे को पार करते हुए कहा "आप मुझे यहाँ बैठा के कहा चली गयी थी? अभी आती हूँ कह के पूरे दो घंटे बाद आई है आप। "
सरदार जी जो आगे-आगे चल रहे थे, अपनी गर्दन थोड़ी सी पीछे घुमाई और कल्पित की ओर देख कर कहा, "बेटा तुम्हारे लिए खाना लेने गयी थी। अब फिकर मत करो, वाहे गुरु ने सब ठीक कर देना है।" कल्पित को उनकी भारी आवाज में कही गई बातें कुछ समझ में नही आयी। जिया सोच रही थी, "आखिर कल्पित यहां तक पहुँचा कैसे, वह ऐसा क्यों कह रहा है कि मैं उसे यहां ले कर आई। शायद वह नींद में चलकर यहां तक आ पहुँचा।"
ढ़ाबे के बाहर एक हवलदार खड़ा मिला। उसने कडककर पूछा -क्यों सरदारजी, कि गल है? "हवलदार साहब ये बच्चा गुम हो गया था इसलिये आपको तकलीफ दी। वाहे गुरु जी की कृपा से अब हमारे साथ है।" सरदार जी ने अपनी पगड़ी ठीक करते हुए कहा।
"कोई बात नही सरदार जी अपना तो काम ही जनता की सेवा करना है।" "पर ये लड़का खोया कैसे? आप लोग कँहा जा रहे थे?" हवलदार ने जिया से पूछा। जिया ने बिस्किट का पैकेट कल्पित को देते हुए हवलदार से कहा, "हम किशनगंज जा रहे थे, वहाँ कल्पित के दादा जी रहते है । कल्पित मेरे दीदी का बेटा है।"
हवलदार का चेहरा पीला पड़ गया, पास में रखा पानी का गिलास एक सांस में गटक गया और कहा , "हड़बड़ी में मैं आपको बताना भूल गया, जो बस किशनगंज के लिए जा रही थी, यँहा से पाँच किलोमीटर के बाद ही बस का ब्रेक फैल होने के कारण बस खाई में गिर गई। कोई भी नहीं बचा। आप किस्मतवाले है जो उस बस से उतर गए।
"
जिया का दिल धक्क से रह गया। वह पास के रस्सी के खाट पे धड़ाम से बैठ गयी। आज की घटी सारी घटनाएं एक-एक कर उसके जेहन में तैरने लगी।
फिर चाहे वो कल्पित का सवाल हो "लाल रंग बहुत प्यारा होता है ना" या बार-बार दीदी की यादें, उनको अपने आस पास महसूस करना। कल्पित का गायब होना और मिलने के बाद कहना, "मौसी तुम ही तो मुझे यहां ले कर आई थी" "मौसी तुमने लाल साड़ी पहनी थी कब बदल दी"।
जिया ने ऊपर आसमान में देखा, अब बादल छट चुके थे। दो तारे आसमान में मध्यम रोशनी में टिमटिमा रहे थे। कल्पित ने जिया को हिलाया और जब जिया कल्पित को देख रही थी उसने जिया से पूछा,"मौसी, क्या मम्मी को लाल रंग बहुत पसंद था" ।
Reference- Santosh Bastiya(Writer)

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