<> >

हिंदी कहानी: माँ शब्द ही जन्नत है

हिंदी कहानी: माँ शब्द ही जन्नत है


माँ शब्द ही जन्नत है। धरती पर अगर इस कलयुग में ईश्वर है तो वो है माँ। ये कभी आप का बुरा नहीं चाहती। जब हम छोटे थे, कोई गलती हो जाती थी और पापा से पीटने की बारी होती, तो हमे बचाने के लिए कई झूट बोल देती थी। और पीटने से बचा लेती थी। कभी-कभी तो पापा के द्वारा चलाए गए थप्पड़ के बीच मे आ जाती थी और खुद थप्पड़ खा बैठती थी। लेकिन हमें कभी नहीं पीटने दिया।

आप पढ़ रहे है Patralekhan.com पर हिंदी कहानी: माँ शब्द ही जन्नत है

www.patralekhan.com हिंदी कहानी: माँ शब्द ही जन्नत है

एक और चीज की कभी गुस्सा नहीं होती मुझ पर। हालांकि कभी-कभी मैं गुस्सा जरूर हो जाया करता था। एक बार तो मैं नाराज होकर घर छोड़ने का प्रयत्न कर लिया। कपड़े पैक किये, और जैसे ही निकलना चाहा सामने माँ पड़ गई और एक बार फिर सारा गुस्सा मुझे थूकना पड़ा था। कभी-कभी माँ कमजोरी भी बन जाती है। यही कारण था कि मैं दरवाजे से एक कदम भी आगे नहीं बढ़ाया और फिर हम दोनों बहुत देर तक रोते रहे थे। यकीन मानियेगा जिस दिन अपने ईश्वर,अपने भगवान,अपने खुदा रूपी उस माँ के पैर छूके निकला हूँ, उस दिन बिगड़े से बिगड़े काम भी सम्हल गए हैं। ये उनकी दुवाओं का असर रहा है।
(adsbygoogle = window.adsbygoogle || []).push({});
जितने कर्तव्य वो निभाती है मुझे लगता है उसके कर्तव्यों का 1 प्रतिशत भी हम नहीं निभा पाते। लेकिन कभी मलाल नहीं रहता उसे इसका। भले आप उसे घर से आज बाहर का रास्ता दिखा दे, कभी बददुआ नहीं देती है।
ऐसी ही एक कहानी है, कमलेश की। कमलेश एक गरीब घर का लड़का, उसके पिता जो कि वो छोटा था तभी भगवान के हो गए। उसकी माँ घर में झाडू बर्तन करती थी। झाड़ू बर्तन करते उसे पाला उसकी माँ ने। आज कमलेश ने इंटरमीडिट पास किया था और अब वो दिल्ली पढने जाना चाहता था। उसकी माँ ने अपने जमीन को गिरवी रख उसे पढ़ने के लिए भेज दिया।
अब वो शायद अपने बेटे के सहारे सुखद भविष्य का अनुभव करने लगी थी। कमलेश भी अपनी माँ को बहुत मानता था। जब भी छुट्टियां मिलती अपने घर को भागता था और अपने माँ का ख्याल भी रखता था। जल्द ही कमलेश की पढ़ाई पूरी हुई और उसे एक प्राइवेट कंपनी में जॉब भी मिल गई। माँ बहुत खुश हुई सुनकर। और भला क्यों ना कोई माँ खुश हो, जिस बीज को 9 महीने पेट मे रखने के बाद उसे पौधे का रूप दिया था, उसे सींचा, अब जब उसके अंकुरित होने के दिन आये थे, भला क्यों ना खुश हो। लेकिन उसे क्या पता था की ये खुशियाँ सिर्फ चंद दिनों की मेहमान है।
किसी लड़की के प्यार में पड़ गया था कमलेश। जो कमलेश बिना माँ से पूछे बगैर कोई काम ना करता था। आज बिना माँ से पूछे बिना माँ से बताये अपने जिंदगी का सबसे अहम फैसला ले लिया और उसने शादी कर ली। माँ ठहरी गांव की उसे क्या पता था। अब कमलेश ने शराब भी पीनी शुरू कर दी थी।
खैर आज कमलेश को पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई थी और इस उपलक्ष्य में उसे लोगों को पार्टी भी देनी थी। इस खास मौके के लिए उसे माँ की याद आयी। चला गया गाँव। माँ को जब बताया, एक तरफ तो माँ थोड़ी सी गुस्सा हुई। लेकिन कब तक बेटा तो अपना ही था। अपना झोला बैग लिया और निकल पड़ी अपनी बहू और पोते से मिलने।
आज शाम को पार्टी है। बहुत सारे लोग जुटे हैं। कमलेश की माँ फूले नहीं समा रही है कि मेरा बेटा इतना बड़ा हो गया है। तभी देखती क्या है कि कमलेश अपने दोस्तों के साथ शराब पीने जा रहा है। अब तो एकदम बेकाबू सी हो गई, माँ जो थी। दौड़ पड़ी अपने कमलेश के पास जाते ही दो थप्पड़ जड़ दिए। उसे डांटने लगी, इसी दिन के लिए तुम्हे बड़ा किया था कि तू शराब पिये। ये थप्पड़ कमलेश बर्दास्त नहीं कर पाया और उल्टे एक थप्पड़ माँ को जमा दिया।
ये एक माँ पर हो रहा एक पर एक जुल्म ही तो था। लड़के का बिना पूछे शादी करना, फिर ये शराब और आखिर में उसके ऊपर थप्पड़ चला देना। वो उसी वक़्त गाड़ी पकड़ी और निकल ली गांव के लिए।
आज गांव पहुंच कर यही सोच रही थी कि गलती कमलेश की नहीं मेरी ही है। वो अगर उसे पढ़ने बाहर न भेज कर अपने पास ही रखती। यही होता कि गरीबी में ही जीवन काटता लेकिन उनका बेटा इस तरह का कार्य तो नहीं करता, शराब तो कत्तई नहीं छू पाता, और बड़ो का सम्मान वो भी उसने खो दिया। यंहा रहता तो कभी ये सब नहीं सिख पाता।
कुछ दिन गांव में इधर उधर से ले देकर खाती पीती। जमीन जायदाद तो बची नहीं थी सारी तो कमलेश की पढ़ाई में ही बेच दिया था। सोचा क्यों ना दिल्ली ही चलूँ वंही भीख माँग कर गुजारा कर लुंगी और फिर कभी बेटे, बहु और पोते के दर्शन भी मिल जाएं शायद।
वो दिल्ली पहुंच किसी चौराहे पे पड़ी है लोगों के सामने हाथ फैलाती है। वंही फुटपाथ ही जैसे उसका घर हो। इधर कमलेश की तबियत इन दिनों खराब हो गई है। शायद दारू ज्यादे पिने की वजह से उसका लिवर में इन्फेक्शन हो गया है। इधर कमलेश का बच्चा उसी फुटपाथ से गुजर रहा था तो बुढ़िया ने हाथ फैला दिए। लड़के ने उसे 5 रुपये थमाते हुए बोला। माँ मेरे पापा के लिए दुआ मांगना की वो जल्द ठीक हो जाएं।
उस माँ के ऐसे भाग्य की उसका पोता उसे पैसे दे रहा है और वो उसे पहचान भी नहीं पा रही। उसने लड़के से बोला.....
"क्या हुआ बेटा तुम्हारे पापा को,
"मेरे पापा अस्पताल में भर्ती हैं उनका लिवर खराब हो गया है और उनका लिवर चेंज करना पड़ेगा। तुम दुआ करना की उनके मेल का कोई लिवर मिल जाये।
माँ बहुत दुखी हुई, उसे अपने पति की याद आ गई कि कैसे वो भगवान को प्यारा हो गया था एक पत्नी और एक बच्चे को छोड़कर। वो सह नहीं पाई और बोली बच्चे से की चल बेटा शायद मेरे लिवर तुम्हारे पिता के काम आ जाये।
चली गई अस्पताल जब देखा अपने ही बेटे को लेटे हुए बेड पर। एक बार के लिए उसके मन में ईष्या जरूर जगी लेकिन। सोचा कि मेरे जीवन का कोई मतलब नहीं। अपने पति को खो ही चुकी हूं अब बेटे को नहीं। तुरंत डॉक्टर से चेक अप कराया और अपना ही लिवर ट्रांसप्लांट करवाया।
इधर वो बेड पर पड़ी है उधर उसका बेटा मौत की मुख से बाहर आ गया है। कमलेश ने सोचा उस व्यक्ति के दर्शन कर लूँ जिसने उसे दुबारा जीवन दिया है। जैसे ही उस महिला को देखता है। उसके नीचे से जैसे, धरती खिसक जाती है। लगा माँ को गले लगाकर रोने। माँ मैने तेरी कद्र नहीं कि और एक तू है जिसने इतना सब कुछ होने के बाद भी दूसरा जन्म मुझे दे दिया।
माँ तू माँ नहीं रे भगवान है तू। और मैं अभागा भगवान को ही नहीं पहचान पाया।
आज माँ से ये प्रार्थना करता है कि माँ अब मैं कभी शराब नहीं पियूँगा, कभी नहीं सताउंगा रे उठ जा ना माँ, आज उसकी माँ ईश्वर को प्यारी हो गयी और इधर कमलेश आज समझ पा रहा था कि माँ जिसकी मैने कद्र ही नहीं कि वो इतने कष्ट सहती रही कि मैं शायद इसे अच्छे दिन दिखा सकूं। जो उसने दुख काटे थे उसे सुख में तब्दील कर सकूं। और वो कष्ट सहते हुए भी कभी मेरा बुरा नहीं चाहा और आज एक बार और उसने मुझे जीवन दे दिया।
Reference- पं०भारद्वाज तिवारी "सिंकू"(लेखक)
Previous
Next Post »