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चरित्रहीन: एक छोटी सी भावुक हिंदी कहानी

चरित्रहीन: एक छोटी सी भावुक हिंदी कहानी 


चरित्रहीन चरित्रहीन चरित्रहीन"रमन द्वारा बोले गए यह शब्द भड़-भड़ हथौड़े सा आघात कर रहे उसके दिल पर लगातार।उसको समझ ही नही आ रहा जिस शब्द को सुनने तक मे वो अपना अपमान समझती है,जिस चरित्र की आन के लिए उसने न जाने क्या क्या समझौते किए,आज वही चरित्रहीन शब्द उसके लिए??चरित्रहीन है वो?राधा के दांत बार बार खीज के कारण भींच जा रहे है,घिन आ रही है उसे अपने आंखों से निकलने वाले आँसुओ से।क्यो यह आंसू ??पश्चाताप या क्रोध?अपनी पढ़ाई के दौरान ही सुना,समझा था शब्द "चरित्रहीन"।माँ ने भी समझाया था और भाभी ने भी
चरित्रहीन: एक छोटी सी भावुक हिंदी कहानी

कभी किसी लड़के से मतलब ही नही रखा उसने की उसको "चरित्रहीन" न कह दे कोई।किशोरावस्था में कभी अच्छे से तैयार होने पर मन अजीब गुदगुदाने सा लगे जब,वह अपने भावी पति की कल्पनाएँ करने लगती थी।वो उसका हाँथ पकड़ कर बिठाएंगे अपने पास तो शर्मा जाएगी वो।शर्मा कर शायद उनके ही गले...विचार करते ही शर्मीली सी मुस्कान आ जाती उसके चेहरे पर।स्नातक की पढ़ाई के दौरान कई लड़कों ने उससे बात करनी चाही पर वह हमेशा गम्भीरता का मुखौटा ओढ़े रही।स्नातक के आखिरी साल में ही उसके लिए रिश्ते देखे जाने लगे।परीक्षा होने से पहले ही विमल से शादी तय हो गई।
मायके से दूर होने के दुख और पति के प्रेम की कल्पनाओं के मेलजोल के विचारों के साथ आ गई विमल के घर वो।उसे याद है मन में न जाने कितनी कल्पनाओं के साथ बैठी थी वो अकेली कमरे में।नंद बैठा गई थी उसको ।उसी कमरे में उसके मायके से आया सामान भी रखा था।बहुत देर बैठे बैठे उसे नींद सी आने लगी,बेड पर टेक लगा कर वो लगभग बैठे बैठे ही सो गई।खट्ट की आवाज हुई तो हड़बड़ा कर खड़ी हो गई,विमल ने दरवाजा बंद किया था।अपने सपनो के राज कुमार अपने पहले प्यार को देख कर कंपकपी सी हो गई उसके पूरे शरीर मे
उनके छूने मात्र से महक जाएगी वो,तन बदन मन में संगीत सा बज रहा था उसके।विमल पास आकर बेड पर बैठ गए।उसको खड़ा देख उसका हाँथ पकड़ कर जोर से खींचा उसको,जिसकी आशा नही थी राधा को।धड़ से गिरी वो बेड पर पेट मे बेड का कोना घुस गया,आह निकल गई।टेढ़ी सी बेड पर गिरी थी राधा ,तो विमल ने उसके पैर खींचे नीचे को बेड पर उसको सीधा करने के लिए ,"आह,मेरे बाल" उसके लम्बे बाल बगल में लगे टेबल लैम्प में फंसे थे,बुरी तरह खिंच रहे थे।पर वो इसके आगे कुछ कहती कि विमल का एक हाँथ उसके मुंह पर,और दूसरे हाँथ से विमल की मनमानी उसके शरीर पर।
उस दिन भी आंसू निकल रहे थे उसके ।समझ नही पा रही थी वो कि यह बाल खींचने बाल टूटने का दर्द है ??या राजकुमार की कल्पनाओं के टूटने का।उसके बादलगभग यही क्रम रोज ही रहा।विमल का कमरे में आना और उस पर मनमानी करना।राधा ने मन ही मन इसी को पति का प्यार समझना शुरू कर दिया ।एक बात दुख देती थी उसे विमल कोई बात राधा से सीधा न कह कर वाया माँ के कहता था।उसको कुछ खाना होता माँ को बोलता मां राधा को बोलती आज यह बना लेना विमल के लिए।कहीं बाहर का टूर होता माँ बताती विमल का बैग लगा देना।यही विमल के उच्च संस्कार थे।
उसका मन होता था विमल उससे कुछ बात करें।प्यार से हाँथ पकड़े,प्रेम से उसको गले लगाए ,पर.....।एक रोज विमल अपनी कम्पनी की बड़ी कामयाबी पर बड़ा खुश था,घर मे सबसे हंसी मजाक कर रहा था,खाते वक्त उसका भी नाम लिया,"राधा,हलवा और दो थोड़ा"।वह पास गई तो उसकी ओर देखा भी,राधा को विमल की आंखों में देख कर प्यारी सी झनझनाहट हुई।हो भी क्यों न उसका पहला प्यार है वो।मन आज फिर कल्पनाओं में विचरने लगा।सब काम समेट कर कमरे में पहुंची तो विमल भी अपने कागजात समेट रहा था।वह भी पास जाकर खड़ी हो गई।
अपने काम के बीच एक दो बार विमल की नजर पड़ी राधा पर,कुछ बोला नही।काम समेट कर उसका हाँथ पकड़ कर बढ़ा बेड की ओर और बोला "चल"।बहुत सारी हिम्मत जुटा कर राधा बोली ,"सुनो जी,मेरा मन होता है कि आपके गले लगूँ कभी"।तड़ाक......जोरदार तमाचा लगा राधा की कनपटी पर,"स्साली,अपने मन की बताएगी"।और उस रात विमल ने अपनी मनमानी के साथ राधा को उसकी गलती की कुछ सजाएं भी दी।राधा आज तक नही जान पाई गलती क्या थी उसकी,अपने मन की बात पति से नही तो किससे??यूं ही रोते गाते लगभग एक साल हो गया।
एक दिन किचन में काम करते हुए उसने जोर से कुछ गिरने की आवाज सुनी,भाग कर बाहर आई तो सासू माँ पूजा की थाली लिए बेहोश हो कर गिर गई थीं।घर मे कोई नही था,उसको पता था यहां से तीसरा घर डॉ राय का था,वो आते थे कभी कभी यहां।भाग कर गई उनको बुलाने,डॉ साहब ने उनको उठाने में भी मदत की,और उनका उपचार भी किया।कुछ टेस्ट कराने को भी बोले।उसके बाद विमल भी आ गए कुछ देर में,माँ के सभी टेस्ट कराए गए,उनको शुगर की बीमारी निकली,लापरवाही के कारण कुछ ज्यादा ही बढ़ गई थी,रोज इंजेक्शन लगाने होंगे डॉ बोले।
डॉ राय ही आ जाते थे रोज सुबह इंजेक्शन लगाने।वो जितने देर माँ के पास रुकते उतनी देर में वो चाय बना लाती थी,वो रोज ही कहते,"अरे राधा जी आप बेकार ही परेशान होती हैं,चाय की क्या जरूरत"।बात तो छोटी सी है पर राधा को उनका बोलना अच्छा लगता ।अब तो चाय देते समय उसके कान उत्सुक रहते रमन की आवाज सुनने को,हां डॉ राय का नाम रमन राय ही है। यह सिलसिला लगभग 20 दिन चला,अब तो रमन को देखने सुनने की आदत हो गई थी उसे। कि एक दिन रमन का फोन आया,राधा जी माँ आ सकें अगर तो आप माँ को लेकर मेरे घर आ जाएं,मेरा निकलना हो नही पा रहा।
माँ को बोला तो तुरंत तैयार हो गई।दोनो जब घर पहुंची एक छोटी बच्ची की आवाजें आ रही थी।"नही नही नही,मुझे चोटी ही करनी है बस"।रमन जी उसको कुछ समझा रहे थे।उन दोनों के पहुंचने पर वो इंजेक्शन की तैयारी करने लगे,तब तक राधा ने अंदर झांका तो एक 8 साल की प्यारी सी बच्ची अपने बालों को कंघी से लपेट रही थी,राधा को हंसी आ गई।उठ कर गई अंदर,पूछा "क्या हो रहा है??""आप कौन" बच्ची ने भोलेपन से पूछा।"मैं राधा""राधा,देखो न मुझे चोटी करनी है और पापा करते ही नही"मुंह बिचका कर बोली वह।"तो माँ को बोलो न।" राधा ने हंस कर कहा।
"माँ नही है,भगवान पास गई""हे राम", कह कर चिपका लिया बच्ची को सीने से राधा ने।फिर सामने बिठा कर उसकी चोटी की।थैंक्यू राधा कह कर गाल चूम लिए सपना ने।बातों बातों में उसने अपना भी नाम बता दिया राधा को।"अब मैं चलती हूँ", उठ कर चलने को हुई राधा।उसका हाँथ पकड़ कर उसकी आँखों मे झांक कर बहुत धीरे से बोली सपना,"कल भी आओगी न चोटी करने?"।"हाँ पक्का" मना नही कर पाई उस मासूम को राधा।घर का सारा काम समेट कर रोज आ जाती थी राधा सपना के पास।उसकी चोटी करती और उसके दूसरे भी छोटे मोटे काम कर देती।
दोनो खेलती आपस मे।हंसी मजाक करती।सपना राधा को राधा ही बोलती थी।कई बार रमन ने सिखाया आंटी बोलो"न राधा" सपना का एक ही जवाब।कभी कभी तो वह किचन भी बना देती सपना की पसन्द का।रोज आते जाते रमन से भी दो चार बातें हो जाती थीं।राधा को रमन का बोलना,रमन की आंखों में सम्मान बहुत अच्छा लगता था।एक तरह से रमन और सपना राधा के जीवन का हिस्सा बन गए थे।एक दिन वह गई तो रमन कुछ पढ़ रहे थे।सपना सो रही थी,सपना ने कल मूंग दाल हलवे की फरमाइश की थी।वो किचन में जा कर तैयारी करने लगी।
मिक्सर को ज्योंही हाँथ लगाया,ऊपर से लटकता हुआ तार कहीं से कटा हुआ था,कंधे में टच हो गया,मुंह से घिघ्घी सी निकली और वो तार में चिपक गई।रमन ने सुन लिया था दौड़ कर आए,तार खींच कर हटाया।राधा को लगभग बेहोशी सी हो गई।सहारा देकर उसको जमीन पर लिटाया।कुछ देर में जब उसकी बेहोशी खत्म हुई तब ध्यान कंधे की चोट पर गया।रमन ने भी देखा, उसकी मरहम पट्टी की।सपना तबसे राधा राधा करके रोए ही जा रही थी।रमन उसको समझा रहे थे।और बेखयाली में सहानुभूति वश राधा के सिर पर हाँथ फेर रहे थे।यह स्पर्श राधा के लिए नया था,उसे अच्छा लग रहा था।
कुछ देर आराम करके वो अपने घर निकल गई।अगले दिन रमन का फोन आया तुम न आओ आज मैं आ जाता हूँ पट्टी करने,पर राधा को सपना से मिलना कुछ देर वहां रुकना अच्छा लगने लगा था,बल्कि उसे आदत पड़ गई थी।सो बोली नही मैं ही आती हूँ।रमन के घर गई,तुरंत कुर्सी पर बिठाकर फ्रूट जूस दिया रमन ने।पूछे कुछ खाई हो?लो अच्छा यह खा लो फिर पट्टी....।बीच मे बॉक्स लाकर वहीं उसकी पट्टी करने लगे,रमन की उसके लिए चिंता,देखभाल,उसको सेहत के लिए निर्देश,अधिकार से समझाना,रमन का स्पर्श बहुत अच्छा लग रहा था सब।अलग ही दुनिया मे उड़ी जा रही थी वो।
बातों में रमन अचानकबोले "राधा आगे की पढ़ाई क्यों नही शुरू कर देतीं??तुम्हारा अकेलापन भी कम हो जाएगा।"राधा ने अचकचाकर रमन की ओर देखा। अकेलापन? रमन भी सकपका गए।मतलब रमन सब समझते हैं।कुछ बातें राधा ने कही नही पर रमन समझ गए।कुछ सेकेंड की शांति के बाद रमन उसकी कुर्सी के पीछे खड़े होकर,उसके सिर पर हाँथ फेरते हुए बोले,"कोशिस करो राधा,समय बदल सकता है,मैं हमेशा तुम्हारे साथ हूँ"।गहरी सी सांस ली राधा ने शायद सुकून की।उन दिन काफी देर रुकी थी राधा,बहुत सारी बातें की तीनों ने मिलकर।
एक हफ्ते में ही रमन उसके लिए बीएड का फार्म ले आए,उनका ही विचार था,बच्चों के बीच रहोगी सब दुख भूल जाओगी।महीने भर बाद से बीएड का नया सत्र शुरू होगया।राधा ने जाना शुरू कर दिया।विमल को इस सबसे कुछ लेना देना नही था।रमन और सपना से मिलने अभी भी वह रोज जाती थी।सपना से अलग अब रमन से भी उसका एक रिश्ता बन गया था,एक अधिकार का रिश्ता।वो अपनी पढ़ाई सम्बंधित दिक्कत रमन से साझा करने लगी।रमन भी अधिकार से उससे अपने छोटे मोटे काम कह देते।अक्सर किसी दुख में रोती वो तो,रमन कभी उसके बाल सहलाते कभी हाँथ पकड़ कर हाँथ थपथपाते रहते।
दुख तो कम नही होता पर एक सहारा मिलता था।एक दिन ऐसे ही रोते हुए बोली वह,"सुनो न,मुझे गले लगा लो"फिर जार जार रोने लगी।रमन ने कुछ देर उसको भर नजर देखा,फिर धीरे से खींच कर गले लगा लिया।रमन उसको इस तरह सम्भाल कर पकड़े थे जैसे कांच की हो वह,जोर लगाने से टूट जाएगी।जबकि विमल ने हमेशा उसे चकनाचूर करना ही चाहा।बहुत अच्छा लग रहा रहा रमन की बाहों में।सिमट जाना चाह रही थी पूरा वो रमन में।बहुत देर वो ऐसे ही खड़े रहे।फिर राधा पलटी और सीधा अपने घर।अजीब लग रहा था उसको यह क्या बोल दिया रमन से।अगले 2 दिन न तो विद्यालय गई न रमन के घर।
तीसरे दिन रमन का फोन आया।बोले,"राधा आओ न"बावली सी भागती पहुंची वो।रमन सामने खड़े थे,देख कर थम गए पैर, रमन ने बांहे फैला दीं,भाग कर गले लग गई वो।उसे नही पता क्या गलत है क्या सही,पर उसकी प्यासी आत्मा की प्यास बुझ गई थी आज।इसके बाद कभी खुशी में कभी गम में अक्सर गले लग जाते वे,पर इसके आगे न कभी रमन ने चाहा न राधा ने।एक दिन विद्यालय से लौटते समय कोई सवारी नही मिल रही थी,शायद कुछ झगड़ा झंझट से सब कुछ बन्द करा दिया गया था।बहुत परेशान थी वह।काफी पैदल भी चल ली सवारी की खोज में।पीछे से न जाने कहाँ से साथ मे बीएड करने वाला छात्र अशोक आ गया।
बोला आइए आपको मैं छोड़ देता हूँ।सवारी कोई नही मिलेगी आज।पहले तो सोचा मना कर देफिर ध्यान किया,की जाएगी कैसेतो अशोक के पीछे बैठ गई।घर के सामने अशोक की बाइक से उतर रही थी कि उधर से रमन आते दिखे।उसे अनदेखा कर आगे चले गए।घर जाकरआपका काम और खाना पीना निपटा कर वह रमन के घर गई।रमन वहीं थे,अपने कपड़े इस्त्री कर रहे थे।राधा बोली लाओ मैं कर देती हूँ।बहुत अक्खड़पन से जवाब दिया रमन ने,"कोई जरूरत नही"।हरपल राधा की चिंता करने वाले रमन का नया रूप था यह।आंखों में आंसू भर गए।बिन कुछ बोले घर आ गई।
अगले दिन सपना और राधा दोनो को नही जाना था क्योंकि शहर में माहौल गर्म था तो शिक्षण संस्थान बन्द थे सब।सपना ने कई बार फोन किया,आओ न राधा।गई वो तो रमन नही थे घर मे।सपना के साथ समय बिताने से मन हल्का हो गया उसका।निकल ही रही थी वापस की रमन आ गए।बोले ,"राधा सुनो,मुझे उस लड़के के साथ तुम्हारा आना अच्छा नही लगा,आगे से कोई दिक्कत हो मुझे बुला लेना।"बात बड़ी नही थी,पर थोड़ा अजीब सी थी।फिर भी रमन के मन की करना अच्छा लगता था उसको।उसने फिर आशोक से कभी बात नहीं की।समय बीता सत्र पूरा हुआ,परीक्षा हुई।
विद्यालय में टॉप किया था उसने।उसी विद्यालय में इंटर कक्षाओं को पढ़ाने का न्योता मिला उसको।सब रमन के कारण ही था।बहुत खुश हुए थे रमन।विमल को पता चला तो कुछ नही बोले वो।पर रोज विद्यालय जाने,अपनी कमाई और अपने अस्तित्व की पहचान मिलने से एक आत्मविश्वास सा आ गया था उसमें।उसके आत्मविश्वास के ही कारण,विमल का भी उससे बोलने और व्यवहार का तरीका बदल गया था जैसे।लगभग 2 साल हो गए उसकी नौकरी को।सब अच्छा चल रहा था,कि एक दिन उसके विद्यालय में क्षेत्र के सभी विद्यालयों की खेल प्रतियोगिता कराई गई।
प्रधानध्यापिका को मना करने पर भी उसे प्रतियोगिता का प्रभारी बनाया दिया गया।सभी विद्यालयों से टीम आ गई,किसी काम मे लगी थी वह की पहचानी सी आवाज़ आई,"नमस्ते,मैडम जी"।देखा तो अशोक।"अरे,यहां कैसे""मैं अपने विद्यालय की टीम के साथ आया हूँ""और कैसा चल रहा है सब" जैसी कुछ एक आध बात हुई।फिर वो अपने काम मे लग गई।प्रतियोगिता अच्छे से निपट गई।पुरस्कार वितरण भी हो गया।अभी वो प्रिंसिपल के साथ बैठी,दोनो प्रमाणपत्र पर हस्ताक्षर कर रही थी।जल्दी वो भी हो गया।विद्यालय वार प्रमाणपत्र विद्यालय से आए शिक्षकों को ही दे दिए गए।
सब काम से निपट गई तो याद आया सुबह स्कूटी बिगड़ गई थी,रमन के घर जाने का भी यही समय है,उनको बोल देती हूँ,मुझे भी ले लो विद्यालय से। फोन किया तो बोले 10 मिनट में आता हूँ। लगभग 10 मिनट बाद वह खुद आकर बाहर खड़ी हो गई।आते ही होंगे मन ही मन बड़बड़ाई,कि तबतक रमन की गाड़ी दिखी।कदम आगे बढ़ाए ही थे कि पीछे से अशोक की आवाज आई।"आपने मेरे विद्यालय के 2 प्रमाणपत्र पर हस्ताक्षर नही किए राधा जी"।"ओह,कैसे भी रह गया होगा,आप मेरी मेज पर रखवा दीजिए।मैं कल करके आपके विद्यालय भिजवा दूंगी"।"जी ठीक है" बोल कर चले गए अशोक।
और वह जा कर गाड़ी में बैठ गई।"शर्म नही आती तुमको?""कबसे चल रहा है यह सब?""मना करने के बावजूद मिलती रहती हो उससे"?रमन दांत पीस पीस कर बोल रहे थे।"अरे नही,यह तो मुझे 2 साल बाद मिलेआज विद्यालय में प्रतियोगिता में आए""वो तो अपने प्रमाणपत्र पर हस्ताक्षर की बात कर रहे थे"।लगभग रोते हुए बोली वह।उसके आंसू अनदेखा कर लगभग चीखते हुए बोले रमन "बहाने हैं सब,सच तो यह है कि जो तुमको विमल से नही मिलता,उसको इधर उधर खोजती फिरती हो तुम।""वासना की भूखी हो तुम""चरित्रहीन,चरित्रहीन हो तुम"।"रमननननन" इसके बाद कुछ नही बोली वह।
उतर गई गाड़ी से।पैदल ही चल दी।पूरे घण्टे भर चल कर पहुंची घर।सीधा स्नानघर में घुस गई।शावर के नीचे खड़ी हो गई।आंखों से निकलते आंसू और शावर का पानी दोनो उसके मन पर छपे उस कलंक को नही धो पा रहे थे,जो रमन ने....बहुत देर खड़ी रही यूं ही,शावर के पानी मे जैसे उस चरित्रहीन शब्द को धो डालना चाहती हो जैसे।उस पूरी रात वह सो न पाई।सुबह होते ही नहा कर मंदिर में बैठ गई।अपने लिए निर्णय पर सहमति चाहिए थी ईश्वर की।तैयार हो कर विद्यालय गई।वहां उसने अपने निर्णय से विद्यालय स्टाफ को भी चकित कर दिया।उसने ट्रांसफर के लिए अप्लाई किया था।
होगा कि नही पता नही पर खासा दूर के शहर का ट्रांसफर भरा था उसने।इसके बाद एक हफ्ता हो गया वो रमन के घर भी नही गई।सपना के फोन आए तो उसने बोला बीमार है वो।शायद ईश्वर को भी यही मंजूर था,एक हफ्ते में उसका ट्रांसफर अप्लाय मंजूर हो गया।और लेटर आ गया।स्टाफ बहुत दुखी था।कल निकलना था।रात को खाने के बाद वो कुछ रसीदों,और चाभियों के साथ विमल के पास पहुंची।बिल वगैरह उसको समझाए।फिर चाभियाँ विमल को देकर बोली"यह सब लीजिए,अबसे आप देखिएगा सब।मुझे कल यह शहर छोड़ कर जाना है।वैसे भी आपको मेरी जरूरत नही"।
अवाक सा विमल उसका चेहरा देखते रह गए।आज विमल की आंखों में निरीह बालक सी चिंता दिखी उसे।"सुबह निकलते समय लगा कि रमन से भी मिल लूँ।घर गई तो सामने ही मिले, दाढ़ी बढ़ी हुई थी।कमजोर भी लगे,उसे देखते ही बांहे फैला दिए,"राधा,आ जाओ,तुम जैसी भी हो मैं सदा साथ दूंगा तुम्हारा"।"नही,रमन नहीं" तुम कोई गंगा नही जिसमे नहा कर मैं पवित्र हो जाऊं"मैं तो यह कहने आई थी कि जा रही हूँ दूर, जिससे मेरे कारण तुमको कोई दुख न हो।"तुमने मुझ पर जो उपकार किए उनको मै कभी नही भूल सकती न ही तुम्हारे दिए हुए कलंक को।
"दुनिया भर के दर्द को मिटाने को मैं तुम्हारे गले लगती थी,और अब तुमने जो दिया है दर्द तो दवा कोई नही"।"सपना का ख्याल रखना"।"और अपना भी " कह कर मुड़ गई वो।रमन की आंखों में देख कर वो खुद को कमजोर नही करना चाहती थी।रमन देख रहा था जाती हुई राधा को।मन हुआ रोक लूँ अपनी राधा को पर किस रिश्ते से,किस अधिकार से।अपने अविश्वास से रमन ने अपना अधिकार भी खो दिया था। और अपना पवित्र प्यार भी।
Reference - Varicha Kashyap 
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